नयी दिल्ली , अगस्त 24 -- कांग्रेस महासचिव एवं पार्टी के संचार प्रभारी जयराम रमेश ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की भविष्य की भूमिका को लेकर सामने आयी खबरों पर चिंता जताते हुए सोमवार को आरोप लगाया कि नरेन्द्र मोदी सरकार अंतरिक्ष क्षेत्र में आक्रामक निजीकरण की दिशा में आगे बढ़ रही है, जिससे देश की प्रमुख अंतरिक्ष संस्था की क्षमताएं कमजोर हो सकती हैं।
श्री रमेश ने सोशल मीडिया मंच 'एक्स' पर कहा कि पिछले कुछ दिनों में इसरो की बदलती भूमिका को लेकर सामने आयी खबरों ने पिछले छह दशकों में वैज्ञानिकों और तकनीकी विशेषज्ञों के अथक प्रयासों से विकसित की गयी संस्था के भविष्य को लेकर 'गंभीर चिंताएं' पैदा की हैं।
उन्होंने भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के विकास में विक्रम साराभाई, सतीश धवन, ब्रह्म प्रकाश, यू.आर. राव और ए.पी.जे. अब्दुल कलाम सहित वैज्ञानिकों के योगदान का उल्लेख किया।
उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी भागीदारी बढ़ाने की ऐसी नीति अपना रही है, जो परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में अपनायी गयी उसकी नीति जैसी है। उन्होंने दावा किया कि प्रस्तावित बदलावों की दिशा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और प्रधानमंत्री कार्यालय से तय हो रही है।
उन्होंने कहा, "यह स्पष्ट है कि परमाणु ऊर्जा की तरह मोदी सरकार का अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए भी आक्रामक निजीकरण का एजेंडा है।"श्री रमेश ने आरोप लगाया कि रॉकेट के विकास और निर्माण में इसरो की भूमिका को काफी कम किया जा सकता है तथा कई उपग्रह संबंधी परिसंपत्तियां निजी कंपनियों को हस्तांतरित की जा सकती हैं। उन्होंने तमिलनाडु में प्रस्तावित दूसरे अंतरिक्ष केंद्र को लेकर भी सवाल उठाये और कहा कि सार्वजनिक धन से इसके विकास के बावजूद इसकी जिम्मेदारी किसी निजी कंपनी को सौंपे जाने की संभावना पर स्थिति स्पष्ट होनी चाहिये।
उन्होंने आंध्र प्रदेश स्थित श्रीहरिकोटा अंतरिक्ष केंद्र के भविष्य को लेकर भी चिंता जतायी और कहा कि क्षेत्र में बदलती नीतियों के बीच इसकी दीर्घकालिक स्थिति को लेकर सवाल उठ रहे हैं। उन्होंने कहा कि इसरो ने अपनी उपलब्धियों से देश को गौरवान्वित किया है और प्रधानमंत्री भी कई अवसरों पर इसकी सफलताओं की सराहना कर चुके हैं। उन्होंने अंतरिक्ष क्षेत्र के स्टार्टअप को बढ़ावा देने का समर्थन करते हुए सवाल किया कि क्या उनकी वृद्धि इसरो की कीमत पर होनी चाहिए।
उन्होंने कहा, " अंतरिक्ष स्टार्टअप निश्चित रूप से प्रोत्साहन और समर्थन के हकदार हैं। लेकिन इसरो को, जिसने लंबे समय से निजी क्षेत्र के साथ सफल साझेदारी की है, अब कमजोर और निष्प्रभावी क्यों किया जाये?"श्री रमेश ने दावा किया कि हाल के महीनों में इसरो के 100 से 120 प्रमुख पेशेवरों ने संस्था छोड़ी है। उन्होंने संकेत दिया कि यह संख्या संगठन की बदलती भूमिका को लेकर कर्मचारियों की चिंताओं को दर्शा सकती है।
उन्होंने बाद में भाजपा में शामिल हुए और कथित तौर पर निजीकरण की प्रक्रिया पर सवाल उठा चुके इसरो के एक पूर्व अध्यक्ष का उल्लेख करते हुए संस्था के अन्य पूर्व प्रमुखों से भी इस मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से अपनी बात रखने का आग्रह किया।
देश के अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी कंपनियों और स्टार्टअप की भूमिका बढ़ाने के प्रयासों के बीच रमेश की यह टिप्पणी अंतरिक्ष कार्यक्रम के भविष्य, निजी भागीदारी और दशकों में विकसित इसरो की क्षमताओं के बीच संतुलन को लेकर चल रही राजनीतिक बहस को और तेज करती है।
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