दीमापुर , मई 11 -- नागालैंड विश्वविद्यालय के एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में राज्य के पहाड़ी इलाकों में पानी की कमी को दूर करने और मिट्टी की सेहत को दुरूस्त करने के लिए 'बायोचार' को एक व्यावहारिक और सस्ते समाधान के तौर पर इस्तेमाल करने का सुझाव दिया गया है।

उल्लेखनीय है कि बायोचार एक कार्बन-समृद्ध पदार्थ है जो फसल के बचे हुए हिस्सों और ऑर्गेनिक बायोमास को कम ऑक्सीजन वाली अवस्था में गर्म करके बनाया जाता है।

अध्ययन का निष्कर्ष है कि खेती के कचरे को बायोचार में बदलने से मिट्टी की नमी बेहतर हो सकती है, फसल की पैदावार बढ़ सकती है और टिकाऊ खेती को मदद मिल सकती है। इस अध्ययन में नागालैंड विश्वविद्यालय के अलावा दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग विश्वविद्यालय, उत्तर प्रदेश के एमिटी विश्वविद्यालय और गुजरात के पारुल विश्चविद्यालय के शोधार्थी शामिल थे। यह अध्ययन खेती के क्षेत्र में बायोचार के इस्तेमाल पर जोर देता है।

इससे पता चलता है कि बायोचार मिट्टी में स्पंज की तरह काम कर सकता है, पानी को बनाए रखने में सुधार कर सकता है, सिंचाई की जरूरत कम कर सकता है और मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बढ़ा सकता है। यह मिट्टी के कटाव को कम करने में भी मदद करता है, जिससे यह पहाड़ी खेती के के लिए खासतौर पर सही है।

अध्ययन में बताया गया है कि पानी बचाने के पुराने तरीकों के उलट, जिनके लिए महंगे ढांचे की जरूरत होती है, बायोचार प्रकृति पर आधारित, कम लागत वाला और चक्रीय अर्थव्यवस्था वाला समाधान देता है। खेत के कचरे को मिट्टी के कीमती इनपुट में बदलकर, बायोचार न सिर्फ पानी की उपलब्धता में सुधार करता है बल्कि फसल की पैदावार भी बढ़ाता है, रासायनिक ऊर्वरता पर निर्भरता कम करता है और मिट्टी में लंबे समय तक कार्बन स्टोरेज में मदद करता है।

इन नतीजों का पूरे भारत में भूमिगत जल की कमी, सूखा और मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट जैसी बड़ी चुनौतियों से निपटने के लिए बहुत अधिक महत्व है। शोध से पता चलता है कि बायोचार अपनाने से किसानों को सूखे के दौरान फसल बचने में मदद मिल सकती है, उत्पादकता और आमदनी बढ़ सकती है और खुले में जलाने की बजाय खेती के बचे हुए हिस्सों के निरंतर इस्तेमाल को बढ़ावा मिल सकता है।

यह शोध नागालैंड विश्वविद्यालय के कृषि अभियांत्रिकी और प्रौद्योगिकी विभाग के प्रोफेसर प्रभाकर शर्मा के साथ-साथ जोहान्सबर्ग विश्वविद्यालय, दक्षिण अफ्रीका के डॉ. शाकिर अली, एमिटी विश्वविद्यालय, उत्तर प्रदेश की डॉ. अनामिका श्रीवास्तव और पारुल विश्वविद्यालय, गुजरात के डॉ. कृष्ण कुमार यादव ने किया है।

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