नयी दिल्ली , जून 16 -- उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और चुनाव आयोग से उस याचिका पर जवाब देने की मांग की है, जिसमें आधार को सिर्फ पहचान के सबूत के तौर पर मानने की बात की गई, ना कि नागरिकता, रहने की जगह, घर के पते या जन्मतिथि के सबूत के तौर पर।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी मोहना की पीठ ने वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय की दायर एक जनहित याचिका पर नोटिस जारी किया, जिसमें कहा गया है कि पहचान सत्यापन के अलावा आधार का इस्तेमाल आधार अधिनियम, 2016 और यूनिक आइडेंटिफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया (यूआईडीएआई) द्वारा जारी स्पष्टीकरण के खिलाफ है।

याचिका आधार अधिनियम की धारा 9 पर आधारित है, जिसमें कहा गया है कि आधार नंबर या उसका प्रमाणिकरण अपने आप में नागरिकता या रहने की जगह का कोई अधिकार नहीं देता है। इसमें अगस्त 2023 में जारी यूआईडीएआई की एक अधिसूचना का भी जिक्र है, जिसमें साफ किया गया है कि आधार सिर्फ पहचान के सबूत के तौर पर काम करता है और यह नागरिकता, पते या जन्म की तारीख का सबूत नहीं है।

आधार अधिनियम, 2016 की धारा 9 में कहा गया है कि आधार नंबर नागरिकता या रहने की जगह वगैरह का सबूत नहीं है। इसमें लिखा है, 'आधार नंबर या उसका प्रमाणिकरण अपने आप में आधार नंबर होल्डर के संबंध में नागरिकता या रहने की जगह का कोई अधिकार नहीं देगा या उसका सबूत नहीं होगा।'याचिका के अनुसार इन कानूनी सीमाओं के बावजूद आधार को स्कूल दाखिला, जन्म प्रमाण-पत्र जारी करने, राशन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस और प्रॉपर्टी लेन-देन सहित कई कामों के लिए उम्र, रहने की जगह, नागरिकता और रहने की जगह के सबूत के तौर पर नियमित तौर पर स्वीकार किया जाता है। फॉर्म-6 में जन्म की तारीख और रहने की जगह के सबूत के तौर पर आधार को स्वीकार करने को लेकर एक खास चुनौती दी गई है, जिसका इस्तेमाल नये मतदाता पंजीकरण के लिए किया जाता है।

याचिकाकर्ता का कहना है कि आधार नामांकन सभी 'रेजिडेंट्स' के लिए उपलब्ध है, जिसमें वे विदेशी नागरिक भी शामिल हैं जो पिछले साल कम से कम 182 दिनों तक भारत में रहे हैं। याचिका में कहा गया है कि आधार को रेंट एग्रीमेंट या लोकल चुने हुए प्रतिनिधि से प्रमाण-पत्र जैसे आसान कागजातों के आधार पर हासिल किया जा सकता है।

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