कोलकाता , मई 13 -- पश्चिम बंगाल में नवगठित भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार ने बुधवार को केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को दी जाने वाली 'सामान्य सहमति' बहाल कर दी। इसके साथ ही आठ वर्षों से जारी वह गतिरोध समाप्त हो गया, जब पूर्ववर्ती तृणणूल सरकार ने केंद्रीय जांच एजेंसी से यह अनुमति वापस ले ली थी।
नावन्ना से इस निर्णय की घोषणा करते हुए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि उनकी सरकार ने भ्रष्टाचार के प्रति 'शून्य सहनशीलता' की नीति अपनायी है और कई मामलों में सीबीआई को लंबित स्वीकृतियां पहले ही प्रदान कर दी गयी हैं।
उन्होंने कहा, " पिछले चार वर्षों से चार सीबीआई मामलों को राज्य सरकार ने लंबित रखा हुआ था। कानून के अनुसार सीबीआई या किसी अदालत द्वारा नियुक्त जांच एजेंसी को भ्रष्टाचार के आरोपों में अधिकारियों के खिलाफ अभियोजन चलाने या आरोपपत्र दाखिल करने के लिए राज्य सरकार की अनुमति की आवश्यकता होती है। "श्री अधिकारी ने आरोप लगाया कि पिछली सरकार ने 'भ्रष्ट नौकरशाहों और अधिकारियों को बचाने' के लिए स्वीकृतियां रोक रखी थीं। उन्होंने कहा कि अब तीन विभागों से जुड़े मामलों में आवश्यक मंजूरी दे दी गयी है और सीबीआई को इसकी प्रतियां सौंप दी गयी हैं।"मुख्यमंत्री के अनुसार इन स्वीकृतियों में शिक्षा विभाग से जुड़े शिक्षक भर्ती घोटाले, नगर निकाय भर्ती में कथित अनियमितताओं तथा सहकारिता विभाग से जुड़े भ्रष्टाचार के मामले शामिल हैं, जिनकी जांच अदालत की निगरानी में की जा रही है।
उन्होंने कहा कि विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा ने 'संस्थागत भ्रष्टाचार' के खिलाफ कार्रवाई का वादा किया था और अब सरकार उस प्रतिबद्धता को लागू कर रही है।
उल्लेखनीय है कि दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम के तहत राज्य सरकारें सीबीआई को 'सामान्य सहमति' प्रदान करती हैं, जिससे एजेंसी राज्य में बिना प्रत्येक मामले में अलग अनुमति लेकर जांच और तलाशी कार्रवाई कर सकती है।
यदि यह सहमति वापस ले ली जाती है, तो सीबीआई को प्रत्येक नये मामले में राज्य सरकार से अलग से अनुमति लेनी पड़ती है, जब तक कि किसी संवैधानिक अदालत द्वारा अन्यथा निर्देश न दिया जाये।
ममता बनर्जी सरकार ने नवंबर 2018 में यह 'सामान्य सहमति' वापस ले ली थी। उस समय राज्य सरकार ने आरोप लगाया था कि केंद्र सरकार केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल विपक्ष शासित राज्यों के खिलाफ 'राजनीतिक प्रतिशोध' के तहत कर रही है।
इस फैसले के बाद पश्चिम बंगाल में सीबीआई की कार्यप्रणाली काफी सीमित हो गयी थी और राज्य प्रशासन तथा केंद्रीय एजेंसी के बीच लगातार टकराव की स्थिति बनी रही।
सामान्य सहमति न होने के कारण सीबीआई को शिक्षक भर्ती भ्रष्टाचार जैसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों में जांच के लिए मुख्य रूप से अदालतों के आदेशों पर निर्भर रहना पड़ा।
इसी तनाव के बीच 2019 में कोलकाता में उस समय बड़ा विवाद हुआ था, जब पूर्व पुलिस आयुक्त राजीव कुमार से पूछताछ करने पहुंची सीबीआई टीम को कोलकाता पुलिस ने रोक लिया था।
सामान्य सहमति वापस लेने के बावजूद उच्चतम न्यायालय ने कई मौकों पर स्पष्ट किया था कि अदालत की निगरानी या निर्देश में चल रही जांच राज्य सरकार की अनुमति के बिना भी जारी रह सकती है।
उच्चतम न्यायालय ने 2024 में पश्चिम बंगाल सरकार की उस याचिका को भी विचारणीय माना था, जिसमें राज्य ने बिना पूर्व अनुमति सीबीआई जांच को चुनौती दी थी।
नयी सरकार ने बुधवार की घोषणा के साथ पश्चिम बंगाल में केंद्रीय जांच एजेंसियों के कामकाज से जुड़ा पूर्ववर्ती शासन का सबसे विवादास्पद प्रशासनिक निर्णय प्रभावी रूप से पलट दिया है।
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