भुवनेश्वर , जुलाई 17 -- उड़ीसा उच्च न्यायालय ने एक मामले पर फैसला सुनाते हुये कहा कि पहले से जांचे और खारिज किये जा चुके सबूतों के आधार पर आपराधिक कार्यवाही को दोबारा शुरू नहीं किया जा सकता।

न्यायलय ने 2019 के अवैध पत्थर खनन मामले में एक पुलिस अधिकारी के खिलाफ चल रही कार्यवाही को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि इस तरह का मुकदमा न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है।

न्यायाधीश डॉ. संजीव कुमार पाणिग्रही की एकल पीठ ने खुर्दा सदर थाने के तत्कालीन थाना प्रभारी विक्रम केशरी जेना के खिलाफ निचली अदालत द्वारा संज्ञान लेने के पांच साल पुराने फैसले और विशेष कार्य बल (एसटीएफ) द्वारा दायर किये गये दूसरे पूरक आरोप-पत्र को रद्द कर दिया। फैसले में इस मामले में श्री जेना का नाम आने के हालातों पर भी गौर किया गया। श्री जेना को पूछताछ के लिए उस वक्त बुलाया गया था जब वे राष्ट्रपति पुलिस पदक प्राप्त करने वाले थे। इस मामले में उनके खिलाफ मुख्य गवाह वे ट्रक मालिक थे जिन पर श्री जेना ने खुद पहले कार्रवाई की थी।

न्यायालय ने पाया कि श्री जेना का नाम प्राथमिकी में नहीं था। मुख्य आरोप-पत्र या पहले पूरक आरोप-पत्र में भी उनका नाम नहीं था। दो जांच अधिकारियों ने अलग-अलग छह ट्रक मालिकों के बयानों, गवाहों की गवाही और याचिकाकर्ता के कॉल विवरण रिकॉर्ड (सीडीआर) की बारीकी से जांच की थी और श्री जेना के खिलाफ कोई सबूत नहीं पाया था। इसके बावजूद, मई 2021 में दायर एक दूसरे पूरक आरोप-पत्र में बिना किसी नये गवाह, अतिरिक्त जांच या नये पुख्ता सबूत के, उन्हीं पुरानी बातों के आधार पर श्री जेना को आरोपी बना दिया गया।

न्यायालय ने कहा, "उन्हें दो बार बरी कर दिया गया था। इसके बावजूद बिना किसी नयी जानकारी या सबूत के उनका नाम दूसरे पूरक आरोप-पत्र में आ जाना, न केवल असामान्य है, बल्कि बहुत ज़्यादा और चिंताजनक रूप से संदिग्ध भी है।" न्यायमूर्ति पाणिग्रही ने 'हरियाणा राज्य बनाम भजन लाल' केस में उच्चतम न्यायालय के एक अहम फ़ैसले का ज़िक्र करते हुए कहा कि मुक़दमा जारी रखना क़ानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा, क्योंकि ऐसा लगता है कि यह मामला "सच की खोज से हटकर किसी व्यक्ति के पीछे पड़ने" जैसा हो गया है।

उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता की उस दलील को खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि सीआरपीसी की धारा 197 के तहत पहले से मंजूरी न मिलने के कारण यह मुकदमा अमान्य है। न्यायालय ने कानूनी तौर पर रिकॉर्ड की गई फोन पर की गयी बातचीत के सबूतों की भी जांच की और उसमें कई कमियां पायी। फोन पर बातचीत की मूल रिकॉर्डिंग नष्ट कर दी गयी थी और आवाज की प्रामाणिकता की जांच के लिए आवाज का कोई नमूना भी उपलब्ध नहीं था। न्यायालय ने इन सबूतों से जुड़े मुद्दों को मुकदमे की सुनवाई के दौरान जांचने के लिए छोड़ दिया।

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