कृष्णनगर , अक्टूबर 25 -- पश्चिम बंगाल के नदिया जिले में एक प्रवासी मजदूर दंपती ने अपनी आठ साल की बेटी को देवी लक्ष्मी मानकर उसकी पूजा शुरू कर दी।
प्रवासी मजदूर दंपती ने मिट्टी की मूर्ति की बजाय अपनी आठ साल की बेटी को देवी मानकर पूजा की और बलात्कार, हत्या तथा बच्चों के शोषण के अंत की प्रार्थना की। कोजागरी लक्ष्मी पूर्णिमा के दिन जब पूरे बंगाल में लोग धन-समृद्धि के लिए देवी लक्ष्मी की पूजा करते हैं, तब देबाशीष बिस्वास और उनकी पत्नी लक्ष्मी ने अपनी बेटी श्रुति को पूजा के केंद्र में रखा। देवी लक्ष्मी के रूप में सजी और कुर्सी पर बैठी बच्ची पुजारी द्वारा की जा रही पारंपरिक पूजा का मुख्य केंद्र बनी। परिवार की यही प्रार्थना थी कि समाज ऐसा हो जहां किसी भी लड़की को डर के साये में न जीना पड़े।
प्रवासी मजदूर दंपती का यह कदम एक गहरे दर्द को दर्शाता है, खासकर आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में एक ट्रेनी डॉक्टर के साथ हुए बलात्कार और हत्या, कुलतली में एक लड़की के साथ हुए बलात्कार और हत्या तथा दो साल पहले लक्ष्मी पूजा के दिन कृष्णनगर में एक युवती की बेरहमी से की गई हत्या के मद्देनजर। बिस्वास दंपति के लिए इस तरह की क्रूरता का जवाब घर से ही शुरू होता है। एक लड़की को बोझ या भेदभाव की वस्तु नहीं बल्कि उसी दिव्य शक्ति का रूप माना जाना चाहिए जिसकी समाज पूजा करता है।
लक्ष्मी बिस्वास ने कहा, "हर परिवार अपनी बेटी को लक्ष्मी मानता है। महिलाओं को मातृशक्ति का प्रतीक भी माना जाता है। इसीलिए हमने देवी लक्ष्मी की मिट्टी की मूर्ति की बजाय अपनी बेटी की पूजा करने का फैसला किया।" उनके पति ने बताया कि इस अनुष्ठान का उद्देश्य उस पूर्वाग्रह को चुनौती देना है, जो ग्रामीण समाज के कुछ हिस्सों में लड़कियों को हाशिए पर धकेलता है। देबाशीष ने कहा, "जब से हमारी बेटी का जन्म हुआ है, हमारे परिवार में कई तरह से समृद्धि आई है। फिर भी कुछ लोग आज भी बेटे और बेटी के बीच भेदभाव करते हैं। हम यह संदेश देना चाहते हैं कि बेटी को कभी भी नजरंदाज नहीं किया जाना चाहिए। लड़के और लड़कियों के बीच कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए।
पूजा कराने वाले पुजारी तरुण बनर्जी ने इस प्रतीकवाद को और पुख्ता किया। उन्होंने कहा कि बेटियां भी माताओं के समान ही सम्मान पाने की हकदार हैं और एक बच्ची को लक्ष्मी मानकर उसकी पूजा करना धार्मिक परंपरा के अनुरूप है। उन्होंने उम्मीद जताई कि जिस बेटी का पालन-पोषण गरिमा और सम्मान के साथ किया जाता है, वह बड़ी होकर जिस परिवार में जाएगी, वहां खुशियां और उजाला लाएगी। दुर्गा पूजा के दौरान छोटी बच्चियों को 'कुमारी' मानकर पूजा की जाती है लेकिन कोजागरी पूर्णिमा पर इस दंपती द्वारा अपनी बेटी को लक्ष्मी मानकर की गई पूजा ने एक खास सामाजिक संदेश दिया। अगर महिलाएं और बच्चे हिंसा और भेदभाव के शिकार होते रहें, तो ईश्वरीय शक्ति की पूजा का कोई खास अर्थ नहीं रह जाता।
हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित