चेन्नई , जुलाई 12 -- तमिलनाडु के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर ने कहा है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी)-2020 शिक्षा व्यवस्था को औपनिवेशिक प्रभाव से मुक्त करने का पहला प्रयास है। उन्होंने राज्य में इस नीति को लागू नहीं किए जाने पर चिंता भी व्यक्त की।
श्री अर्लेकर ने कहा कि एनईपी-2020 का उद्देश्य भारतीय शिक्षा प्रणाली को औपनिवेशिक सोच से मुक्त कर उसे देश की संस्कृति, परंपराओं और आवश्यकताओं के अनुरूप बनाना है। उन्होंने इस बात पर खेद जताया कि तमिलनाडु में अब तक इस नीति को लागू नहीं किया गया है।
राज्यपाल ने शनिवार शाम यहां द्वारका डॉस गोवर्धन डॉस वैष्णव कॉलेज (स्वायत्त) में 59वें दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि शिक्षा का दायरा केवल शैक्षणिक सफलता तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसे समाज और राष्ट्र के कल्याण में सार्थक योगदान देना चाहिएउन्होंने छात्रों से मूल्यों, ईमानदारी और जिम्मेदारी की भावना को बनाए रखने तथा राष्ट्र-निर्माण में सक्रिय रूप से भाग लेने का आह्वान करते हुए एनईपी-2020 के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि इसे छात्रों को बेहतर अवसर देने, चरित्र निर्माण को बढ़ावा देने और राष्ट्र-निर्माण की नींव मजबूत करने के उद्देश्य से शुरू किया गया है। उन्होंने कहा, "इतने वर्षों से हम औपनिवेशिक शिक्षा व्यवस्था का पालन करते आ रहे हैं। औपनिवेशिक प्रभाव से मुक्त शिक्षा व्यवस्था या एनईपी-2020 को इसलिए लाया गया क्योंकि इसका मुख्य उद्देश्य एक अच्छा इंसान तैयार करना था।"श्री अर्लेकर ने राज्य में एनईपी-2020 के फायदों की व्यापक जांच किये बिना इसे लागू न किए जाने पर चिंता जताते हुए इसके संभावित लाभों का रचनात्मक तरीके से मूल्यांकन करने के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि शिक्षा व्यवस्था को औपनिवेशिक प्रभाव से मुक्त करना इसकी प्रमुख विशेषताओं में से एक है, जिसका उद्देश्य शिक्षा को भारत की समृद्ध सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत के अनुरूप बनाना है।
राज्यपाल ने नवाचार और आत्मनिर्भरता के महत्व पर जोर देते हुए छात्रों में उद्यमशीलता कौशल को बढ़ावा देने के लिए सभी शिक्षण संस्थानों में 'उद्यमिता विकास सेल' स्थापित करने का आह्वान किया। साथ ही, उन्होंने स्नातकों को नौकरी खोजने वाले के बजाय नौकरी देने वाला बनने के लिए प्रोत्साहित किया, ताकि वे आर्थिक विकास और सामाजिक प्रगति में योगदान दे सकें।
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