पुणे , सितंबर 04 -- रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आरपीआई) के प्रदेश उपाध्यक्ष डॉ. हुलगेश चलवादी ने कहा कि महाराष्ट्र भर में सार्वजनिक त्योहारों के दौरान उच्च क्षमता वाले डीजे और डॉल्बी साउंड सिस्टम के इस्तेमाल पर स्थायी एवं कड़े प्रतिबंध की मांग पूरी तरह जायज है। उन्होंने कहा कि अत्यधिक शोर नागरिकों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर और जानलेवा खतरा पैदा करता है।
डॉ. चलवादी ने कहा कि उच्च क्षमता वाले डीजे सिस्टम चालू होते ही ध्वनि का स्तर 100 से 130 डेसिबल या उससे अधिक तक पहुंच जाता है, जो 55 से 75 डेसिबल की स्वीकार्य सीमा से बहुत अधिक है।
महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्टों के अनुसार, लगातार कई वर्षों से त्योहारों के दौरान 90 प्रतिशत से अधिक शहरी क्षेत्र उच्च स्तर के ध्वनि प्रदूषण का सामना कर रहे हैं।
डॉ. चलवादी ने कहा कि ऐसे आयोजनों में इस्तेमाल होने वाले तीव्र ध्वनि कंपन और लेजर लाइट से सुनने की क्षमता स्थायी रूप से समाप्त होने, आंखों की रोशनी प्रभावित होने और विशेष रूप से बच्चों में गंभीर मानसिक प्रभाव पड़ने जैसे खतरनाक परिणाम हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि तेज आवाज में बजने वाले डीजे संगीत के कारण कार्डियक अरेस्ट से लोगों की जान जाने के मामले भी सामने आये हैं।
सांगली में गणेश विसर्जन जुलूस के दौरान डीजे सिस्टम की तेज आवाज के कारण दिल का दौरा पड़ने से 32 वर्षीय शेखर पवार और 35 वर्षीय प्रवीण शिरटोडे की मौत हो गयी थी। डॉ. चलवादी ने कहा कि अत्यधिक शोर के कारण हर वर्ष कान के पर्दे फटने और उच्च रक्तचाप से पैदा होने वाली गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं सहित सैकड़ों चिकित्सीय आपात स्थितियां दर्ज की जाती हैं। उन्होंने कहा कि डीजे और डॉल्बी सिस्टम के जरिये कान फोड़ू आवाज में संगीत बजाना देश की सांस्कृतिक परंपराओं का हिस्सा नहीं माना जा सकता।
सार्वजनिक त्योहारों का उद्देश्य सामाजिक एकता, सांस्कृतिक जागरूकता और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना को बढ़ावा देना होना चाहिए।
डॉ. चलवादी ने त्योहार आयोजकों से अपील की कि वे उच्च क्षमता वाले डीजे और डॉल्बी सिस्टम के बजाय ढोल-ताशा, लेजिम, हलगी और तुतारी जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों को प्राथमिकता दें। उन्होंने कहा कि पारंपरिक वाद्य यंत्र त्योहारों के सांस्कृतिक स्वरूप को बनाये रखने में मदद करने के साथ-साथ युवा पीढ़ी को महाराष्ट्र की समृद्ध लोक परंपराओं से परिचित करा सकते हैं।
डॉ. चलवादी ने कहा कि आधुनिकता के नाम पर ध्वनि प्रदूषण बढ़ाने के बजाय संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक सौहार्द की रक्षा करते हुए त्योहार मनाने की आज सबसे बड़ी जरूरत है।
हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित