नैनीताल , मार्च 19 -- उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय ने गिरफ्तारी से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में कहा है कि यदि आरोपी को गिरफ्तारी के समय आरोपों का सार लिखित रूप में दे दिया जाता है, तो इसे संवैधानिक प्रावधानों का पालन माना जाएगा।

न्यायमूर्ति आशीष नैथानी की एकल पीठ ने रविकांत बनाम सीबीआई मामले में सुनवाई करते हुए विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट, देहरादून द्वारा पारित रिमांड आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और आरोपी की याचिका खारिज कर दी।

याचिकाकर्ता ने 9 अक्टूबर 2024 के रिमांड आदेश को चुनौती देते हुए कहा था कि उसकी गिरफ्तारी अवैध है, क्योंकि उसे गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में नहीं बताए गए, जो संविधान के अनुच्छेद 22(1) का उल्लंघन है।

अदालत ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि 'गिरफ्तारी के कारण' और 'गिरफ्तारी के आधार' अलग-अलग होते हैं। गिरफ्तारी के आधार वे तथ्यात्मक आरोप होते हैं जिनसे अपराध बनता है और यदि ये आरोप गिरफ्तारी मेमो में दर्ज होकर आरोपी को उपलब्ध करा दिए जाते हैं, तो संवैधानिक आवश्यकता पूरी मानी जाएगी।

कोर्ट ने पाया कि इस मामले में गिरफ्तारी मेमो में भारतीय दंड संहिता की संबंधित धाराएं और एफआईआर का विवरण दर्ज था, जिसे आरोपी को दिया गया था।

सीबीआई की ओर से कहा गया कि गिरफ्तारी के समय ही सभी आवश्यक जानकारियां उपलब्ध करा दी गई थीं, जिससे कानून का पूर्ण पालन हुआ है।

हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित