देवरिया, जनवरी 23 -- पूर्वी उत्तर प्रदेश में देवरिया जिला मुख्यालय से आठ किलोमीटर दूर पैकौली में पवहारी महराज की कुटी दो सौ साल से अधिक समय से प्राचीन वैष्णव परम्पराओं, संस्कृति शिक्षा और धार्मिक अनुष्ठानों को आज भी पूरी निष्ठा से कायम रखे हुये है।

यह गद्दी दौ साल से अधिक समय से संस्कृत की समृद्धि के साथ वैष्णव संप्रदाय का प्रचार-प्रसार कर रही है। कुटी में आज भी गुरु-शिष्य परंपरा जीवित है। वसुधैव कुटुंबकम के मंत्र के साथ कुटी का विस्तार उत्तर प्रदेश व बिहार में 365 शाखाओं तक है। देश के कोने-कोने से लाखों की संख्या में शिष्य जुड़े हैं। पैकौली कुटी के अलावा बैकुंठपुर, गोरखपुर के बड़हलगंज, अयोध्या व बिहार में पश्चिमी चंपारण, आरा, विजयीपुर आदि कुटी प्रमुख हैं। 70 बीघा में फैली मुख्य कुटी पैकौली में श्रीराम, जानकी, लक्ष्मण व हनुमान जी की अष्टधातु की बेशकीमती प्रतिमाएं दिव्य मंदिर में आज भी विराजमान हैं।

कुटी में स्थित मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। पवहारी महराज जमात के साथ गांव में रात्रि विश्राम करते हैं। गुरुमंत्र देने के बाद तुलसी दल प्रसाद के रूप में देने की परंपरा है। पवहारी महराज की कुटी ने देवरिया के बैकुंठपुर में 1958 में श्री बैकुंठनाथ पवहारी संस्कृत महाविद्यालय की स्थापना पंचम पवहारी महराज उपेंद्र दास ने किया। यहां बटुकों को संस्कृत की निशुल्क शिक्षा दी जाती है। काशी की परंपरा का अनुकरण कर इस महाविद्यालय की नींव रखी गई। संस्था आज भी संस्कृत को आलोकित करने के साथ ही समृद्ध कर रही है। यहां से अच्छे-अच्छे वेदपाठी ब्राह्मण पैदा हुए हैं, जो देश में संस्कृत और संस्कूति का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं।

पवहारी महराज के रूप में कुटी में राघवेंद्र दास प्रथम पवहारी महराज, लक्ष्मीनारायण दास जी, दूसरे सियाराम दास, तीसरे अवध किशोर दास, चौथे मणिराम दास जी, पांचवें उपेंद्र दास जी महराज, छठवें ऋषिराम दास जी महराज, राघवेन्द्र दास जी सातवें और वर्तमान में कौशलेंद्र दास जी महराज आठवें पवहारी महराज के रूप में विराजमान हैं।

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