फगवाड़ा , जून 06 -- पंजाब के दोआबा क्षेत्र में वसंत ऋतु में मूंगफली की खेती ने किसानों के चेहरों पर मुस्कान बिखेरी है। भूजल संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली मूंगफली किसानों की आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने में भी सहायक सिद्ध होगी।
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना और कृषि विज्ञान केंद्र, कपूरथला ने मोथावल गांव में एक "क्षेत्रीय अध्ययन और यात्रा संगोष्ठी" का आयोजन किया। इस संगोष्ठी में किसानों को राज्य में भूमिगत जल संरक्षण में योगदान देने के लिए वसंत ऋतु में मूंगफली की खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया गया। पिछले तीन वर्षों से मूंगफली की खेती कर रहे किसानों ने संगोष्ठी के दौरान अपने सफल अनुभव साझा किए। यह द्विवार्षिक फसल रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता नहीं रखती है और मक्का की तुलना में इसमें पानी की खपत बहुत कम होती है।
राज्यसभा सांसद संत बलबीर सिंह सेचेवाल इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे। अपने संबोधन में उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पंजाब के भूजल संरक्षण और किसानों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के लिए फसल विविधता सबसे जरूरी है। श्री सेचेवाल ने याद दिलाया कि दोआबा क्षेत्र कभी मूंगफली की खेती के लिए प्रसिद्ध था। हालांकि, मौसम में बदलाव, कम वर्षा और ट्यूबवेल के अत्यधिक उपयोग के कारण मूंगफली की खेती में रुचि कम हो गई। ट्यूबवेल के अत्यधिक उपयोग से भूमिगत जल पर भी दबाव बढ़ गया है। जो पानी कभी 30 फुट की गहराई पर आसानी से मिल जाता था, अब वह 300 फुट की गहराई पर है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि पंजाब के भूजल का संरक्षण तभी संभव है जब किसान अपनी पारंपरिक फसलों की ओर लौटें।
श्री सेचेवाल ने मोथावल के प्रमुख किसान जरनैल सिंह की पहल की सराहना की, जिन्होंने तीन साल पहले मक्के के विकल्प के रूप में मूंगफली उगाना शुरू किया था। उन्होंने कहा कि जरनैल सिंह के प्रयासों के कारण पंजाब ने एक बार फिर पारंपरिक फसलों पर ध्यान देना शुरू कर दिया है। इस वर्ष, जरनैल सिंह ने 26 एकड़ भूमि पर मूंगफली बोई, जो अन्य किसानों के लिए एक उदाहरण है। इसके परिणामस्वरूप, जिले में मूंगफली की खेती का क्षेत्रफल तीन साल पहले मात्र 9 किलो बीज से बढ़कर आज 72 एकड़ हो गया है।
लुधियाना स्थित पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. सतबीर सिंह गोसल ने इसे एक छोटी लेकिन महत्वपूर्ण पहल बताया। उन्होंने कहा कि वसंत ऋतु में उगने वाली मूंगफली द्विवार्षिक फसल है और मिट्टी की सेहत बनाए रखने में सहायक होती है। इस फसल से प्रति एकड़ 25 से 28 क्विंटल प्रति वर्ष उपज प्राप्त होती है।
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