नयी दिल्ली , फरवरी 03 -- देश में बढ़ती बुजुर्गों की संख्या के बीच अब वरिष्ठ नागरिकों के लिये विशेष देखभाल यानी जेरियाट्रिक केयर अब राष्ट्रीय आवश्यकता बन गयी है।

यह बात यहां एक स्वास्थ्य सम्मेलन में चिकित्सा विशेषज्ञों ने उठायी।

"स्वस्थ और गरिमापूर्ण बुढ़ापे को बढ़ावा देने में जेरियाट्रिक केयर की भूमिका" विषय पर आयोजित इलनेस टू वेलनेस कॉन्फ्रेंस में विस्तार से चर्चा की गई। वक्ताओं ने कहा कि बुजुर्गों के सामने स्वास्थ्य, आर्थिक, सामाजिक और भावनात्मक चुनौतियां एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं।

इस अवसर पर स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के पूर्व सचिव और 'इलनेस टू वेलनेस फाउंडेशन' की कार्यकारी परिषद के अध्यक्ष राजेश भूषण ने कहा कि बुजुर्गों की देखभाल को बड़े अस्पतालों तक सीमित रखना व्यावहारिक नहीं है। उन्होंने कहा कि भारत में इसकी शुरुआत घर से होनी चाहिए और जिला स्तर के मजबूत व्यवस्था के जरिये इसे आगे बढ़ाया जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि कई मामलों में बुजुर्गों को अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत नहीं होती और प्रशिक्षित केयरगिवर्स, होम-केयर सेवाओं और कम्युनिटी सपोर्ट से उनकी जरूरतें बेहतर तरीके से पूरी की जा सकती हैं।

इलनेस टू वेलनेस फाउंडेशन के सलाहकार परिषद के अध्यक्ष अनिल राजपूत ने कहा कि भारत एक बड़े जनसांख्यिकीय बदलाव के दौर से गुजर रहा है। उन्होंने कहा कि बदलते सामाजिक ढांचे, संयुक्त परिवार से एकल परिवार के बढ़ते रुझान के कारण बुजुर्गों की देखभाल की चुनौतियां बढ़ी हैं। ऐसे में गरिमा, आत्मनिर्भरता और भावनात्मक सहारा स्वस्थ बुढ़ापे का अहम हिस्सा होना चाहिए।

एम्स के जेरियाट्रिक मेडिसिन विभाग के संस्थापक एवं पूर्व प्रमुख डॉ. एबी डे ने कहा कि जेरियाट्रिक केयर की मांग मौजूदा व्यवस्था और प्रशिक्षण से कहीं अधिक है। उन्होंने कहा कि स्वस्थ बुजुर्ग (हेल्दी एजिंग) का मतलब केवल बीमारी का न होना नहीं, बल्कि सम्मान, आजादी और बेहतर जीवन जीने की क्षमता है।

सम्मेलन में डिमेंशिया रोकथाम, उनकी देखरेख, पोषण, योग और मानसिक स्वास्थ्य जैसे विषयों पर भी चर्चा हुई। वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि बुजुर्गों के लिए बेहतर भविष्य सुनिश्चित करने के लिए समन्वित नीति, प्रशिक्षित वर्कफोर्स और समाज की सक्रिय भागीदारी बेहद जरूरी है।

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