दुमका , फरवरी 13 -- झारखंड में दुमका जिले के मयूराक्षी नदी के पावन तट पर आज 13 फरवरी से राजकीय जनजातीय हिजला मेला महोत्सव अद्भुत उत्साह और भावनात्मक गरिमा के साथ शुरू हुई।

प्रकृति की गोद में बसे इस मेले ने एक बार फिर जनजातीय परंपराओं, आस्था और सांस्कृतिक विरासत को जीवंत कर दिया। वर्ष 1890 से शुरू हिजला मेला के शुभारम्भ के पूर्व उल्लास जुलूस मानो जनजातीय अस्मिता का चलता-फिरता चित्र बन गया। रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधानों में सजे आदिवासी समाज के पुरुष एवं महिलाएं, हाथों में अपने पारंपरिक वाद्ययंत्र लिए, जब पूरे जोश और गर्व के साथ आगे बढ़ रहे थे, तब वातावरण उनकी सांस्कृतिक धड़कनों से गूंज उठा।

महोत्सव की औपचारिक शुरुआत से पहले हिजला मेला परिसर स्थित मांझी थान में विधिपूर्वक पूजा-अर्चना की गई। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं था, बल्कि अपनी जड़ों, परंपराओं और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता का भावपूर्ण प्रदर्शन भी था। हिजला गांव के ग्राम प्रधान ने परम्परागत तरीके से फीता काटकर मेले का उद्घाटन किया। इस मौके पर दुमका के अनुमंडल पदाधिकारी कौशल कुमार ने मंच के समीप ध्वजारोहण कर कार्यक्रम को औपचारिक रूप से प्रारंभ किया।पारंपरिक रीति रिवाज एवं पगड़ी पहनाकर अतिथियों का स्वागत किया गया।

उद्घाटन के दौरान विभिन्न विद्यालयों की छात्राओं ने सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत कर समां बांध दिया। लोकनृत्य, गीत और पारंपरिक प्रस्तुतियों ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया। इन प्रस्तुतियों में नई पीढ़ी की ऊर्जा और पुरातन परंपराओं की सुगंध का सुंदर संगम देखने को मिला।

यह ऐतिहासिक हिजला मेला केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि जनजातीय समाज का जीवंत सांस्कृतिक केंद्र है। यह वह मंच है जहाँ परंपराएँ सांस लेती हैं, लोक कला खिलती है और सामूहिक पहचान सशक्त होती है। बदलते समय के साथ राज्य सरकार द्वारा मेले को और अधिक भव्य स्वरूप देने के निरंतर प्रयास किए गए हैं। विकसित आधारभूत संरचनाएँ, बेहतर सुविधाएँ और सुव्यवस्थित परिसर मेले के आकर्षण को कई गुना बढ़ा रहे हैं।

महोत्सव की पूरी अवधि में आयोजित कृषि प्रदर्शनी और विभिन्न विभागों के स्टॉल लोगों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बने रहेंगे। ये प्रदर्शनियाँ न केवल झारखंड की पारंपरिक कृषि पद्धतियों और जनजातीय जीवनशैली की झलक प्रस्तुत करती हैं, बल्कि आधुनिक तकनीक और सरकारी योजनाओं की जानकारी देकर लोगों को जागरूक और सशक्त भी बनाती हैं।

हिजला मेला महोत्सव सचमुच परंपरा, प्रकृति और प्रगति का संगम बनकर उभरा है-जहाँ हर धड़कन में संस्कृति है, हर कदम में उत्सव, और हर चेहरे पर अपनी विरासत पर गर्व की चमक।

इस मौके पर उपायुक्त अभिजीत सिन्हा ने कहा कि यह 136वां हिजला मेला केवल एक वार्षिक आयोजन नहीं, बल्कि इस क्षेत्र की जीवंत सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक है। उन्होंने गर्व के साथ कहा कि यह मेला हमारी समृद्ध जनजातीय संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक मूल्यों को सशक्त रूप से प्रदर्शित करता है।

श्री सिन्हा ने कहा कि हिजला मेला प्राचीनता और आधुनिकता का अद्भुत संगम है। यहाँ एक ओर जहां सदियों पुरानी परंपराएँ, लोककला और रीति-रिवाज जीवंत रूप में दिखाई देते हैं, वहीं दूसरी ओर आधुनिक सुविधाएँ और व्यवस्थाएँ भी इस आयोजन को नई पहचान दे रही हैं। यही संतुलन इस मेले को विशिष्ट बनाता है।

श्री सिन्हा ने यह भी उल्लेख किया कि सात दिनों तक चलने वाले इस महोत्सव के सफल आयोजन के पीछे सभी वर्गों का सामूहिक सहयोग है। प्रशासन, स्थानीय जनप्रतिनिधियों, जनजातीय समाज और आम नागरिकों के संयुक्त प्रयासों से यह आयोजन संभव हो सका है।उन्होंने आश्वस्त किया कि मेले में आने वाले लोगों को किसी प्रकार की असुविधा न हो, इसके लिए व्यापक और सुव्यवस्थित तैयारियाँ की गई हैं।सुरक्षा, स्वच्छता, यातायात, पेयजल एवं अन्य आवश्यक सुविधाओं की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित की गई है।

श्री सिन्हा ने कहा कि हमारा लक्ष्य केवल आयोजन तक सीमित नहीं है, बल्कि यहाँ की समृद्ध संस्कृति और सभ्यता को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाना है। हिजला मेला जनजातीय अस्मिता, कला और जीवनशैली का ऐसा मंच है, जिसकी गूंज सीमाओं से परे जानी चाहिए। उन्होंने सभी से आह्वान किया कि इस सांस्कृतिक विरासत को सहेजने और आगे बढ़ाने में अपना योगदान दें, ताकि यहाँ की पहचान विश्व पटल पर स्थापित हो सके।

इस अवसर पर जिला परिषद अध्यक्ष जॉयस बेसरा ने कहा कि आज हम सबके लिए अत्यंत गर्व और प्रसन्नता का दिन है। यह मेला केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि हमारी पहचान, हमारी परंपराओं और हमारी समृद्ध जनजातीय संस्कृति का जीवंत उत्सव है। 20 फरवरी तक चलने वाले इस मेले में संथाल परगना की लोककला, लोकनृत्य, लोकगीत, हस्तशिल्प, पारंपरिक वेशभूषा की अद्भुत झलक देखने को मिलेगी। यह मंच हमारे कलाकारों, कारीगरों और ग्रामीण प्रतिभाओं को अपनी कला प्रदर्शित करने का अवसर प्रदान करता है।

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