बेंगलुरु , अगस्त 02 -- टाटा ट्रस्ट्स के अध्यक्ष नोएल टाटा ने रविवार को बताया कि टाटा इंजीनियरिंग एंड लोकोमोटिव कंपनी (टेलको ) दिवालिया होने से बचने के लिए टाटा मोटर्स में परिवर्तित हुयी थी।
श्री नोएल टाटा ने टाटा ग्रुप के इतिहास के कम चर्चित किस्से का ज़िक्र करते हुए कहा कि टेलको का टाटा मोटर्स में बदलना किसी व्यावसायिक महत्वाकांक्षा की वजह से नहीं, बल्कि वजूद को बनाये रखने की ज़रूरत की वजह से हुआ था।
श्री नोएल टाटा ने बताया कि कंपनी पर यह संकट उस समय आया था जब भारतीय रेलवे ने लोकोमोटिव के लिए समय पर भुगतान नहीं किया, जिससे कंपनी को खुद को ट्रक बनाने वाली कंपनी के तौर पर बदलना पड़ा। उन्होंने बताया कि भारतीय रेलवे उस समय टाटा इंजीनियरिंग एंड लोकोमोटिव कंपनी (टेलको ) की एकमात्र ग्राहक थी।
भारतीय प्रबंधन संस्थान बैंगलोर (आईआईएम-बी) में 'फ्रॉम एंटरप्राइज़ टू इंस्टीट्यूशन बिल्डिंग: द टाटा फिलॉसफी इन ए चेंजिंग इंडिया" (एक उद्यम से संस्थान बनाने तक: बदलते भारत में टाटा की सोच) विषय पर हुई बातचीत के दौरान श्री नोएल टाटा ने कहा कि टेलको को शुरू में लोकोमोटिव बनाने के लिए ही स्थापित किया गया था।
उन्होंने कहा, "पुराने समय में इसे टाटा इंजीनियरिंग एंड लोकोमोटिव कंपनी कहा जाता था क्योंकि इसकी शुरुआत एक लोकोमोटिव बनाने वाली कंपनी के तौर पर हुई थी।"हालांकि, कंपनी के सामने एक बड़ी चुनौती थी। उन्होंने कहा, "इसका सिर्फ़ एक ही ग्राहक भारतीय इंडियन रेलवे थी। कोई दूसरा ग्राहक नहीं था और भारतीय रेलवे ने उन लोकोमोटिव (इंजन) के लिए कभी भुगतान नहीं किया जो उन्होंने लिए थे।"कंपनी के भविष्य पर मंडराते वित्तीय संकट को देखते हुए, तत्कालीन महाप्रबंधक सुमंत मूलगांवकर ने तय किया कि टेलको को कारोबार का एक नया रास्ता खोजना होगा।
उन्होंने कहा, "उन्होंने कहा कि हम इस तरह से काम जारी नहीं रख सकते। वह मर्सिडीज-बेंज के पास गए और कहा कि देश को ट्रकों की भी ज़रूरत है। क्या आप ट्रक बनाने में हमारी मदद करेंगे? इस तरह टाटा मोटर्स की शुरुआत हुई, क्योंकि हमें लोकोमोटिव बनाने के लिए भुगतान नहीं मिल रहा था और हम लगभग दिवालिया हो चुके थे।" उन्होंने कहा कि यह घटना टाटा ग्रुप की उस पुरानी सोच को दिखाती है जिसके तहत वे सिर्फ़ व्यावसायिक मौकों के पीछे भागने के बजाय भारत की विकास संबंधी ज़रूरतों के आधार पर कारोबार खड़ा करते हैं।
समूह के इतिहास का ज़िक्र करते हुए श्री नोएल टाटा ने टाटा पावर का एक और उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि कैसे सर दोराबजी टाटा को बॉम्बे में टेक्सटाइल मिल मालिकों को कोयले से चलने वाले स्टीम इंजन की जगह बिजली से चलने वाले इंजन लगाने के लिए मनाना पड़ा था, जबकि उस समय इस तकनीक को शक की नज़र से देखा जाता था।
उन्होंंने कहा, "वह सचमुच एक मिल से दूसरी मिल गए और उन्हें बताया कि अब उन्हें अपनी फैक्ट्रियां चलाने के लिए स्टीम की ज़रूरत नहीं है।" उनके अनुसार, टाटा ग्रुप के कई अहम कारोबार इसलिए शुरू हुए क्योंकि उन्होंने भारत के विकास के अहम मौकों पर राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को पूरा किया। टाटा समूह के पूर्व अध्यक्ष जे.आर.डी. टाटा के नज़रिए को याद करते हुए उन्होंने कहा कि समूह की रणनीति हमेशा से बहुत सरल रही है।
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