नयी दिल्ली , अप्रैल 01 -- राज्यसभा ने दिवाला एवं ऋण शोधन अक्षमता (संशोधन) विधेयक, 2026 को बुधवार को चर्चा और उस पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के जवाब के बाद ध्वनिमत से पारित कर दिया।

इसके साथ ही इस विधेयक पर संसद की मुहर लग गयी है। लोकसभा इसे पहले ही पारित कर चुकी है।

श्रीमती सीतारमण ने विधेयक पर हुई संक्षिप्त चर्चा का जवाब देते हुए कहा कि देश में दिवाला संहिता 2016 में बनायी गयी और 2019 में विश्व बैंक ने इसे सबसे कारगर दिवाला प्रक्रियाओं में जगह दी थी। उन्होंने कहा कि इस संहिता ने देश के बैंकिंग क्षेत्र की हालत सुधारने में मदद की है और बैंकों के ऋणों की कुल 1.04 लाख करोड़ रुपये की वसूली में इसका योगदान 52 प्रतिशत है।

वित्त मंत्री ने स्पष्ट किया कि दिवाला प्रक्रिया ऋण वसूली की प्रक्रिया नहीं बल्कि यह संपत्ति के मूल्य को दोबारा अर्थव्यवस्था में लाने तथा ऋण के बोझ के तले दबी कंपनियों को परिसमापन से बचाने की प्रक्रिया है। ऋण वसूली इसका एक सहायक हिस्सा है। उन्होंने कहा कि दिवाला संहिता के पिछले दस वर्षों के अनुभवों के आधार पर इसे उद्योग और हितधारकों की जरूरत के हिसाब से संशोधित किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि लोकसभा की प्रवर समिति ने विधेयक के मसौदे पर संशोधन सुझाये थे जिसमें सरकार ने अपनी ओर से एक और संशोधन जोड़कर कुल 12 संशोधनों के साथ इसे पेश किया है। इसका मुख्य उद्देश्य दिवाला प्रक्रिया को स्वतंत्र बनाये रखना, तेज करना और ऋणदाताओं की ओर से समाधान की व्यवस्था का उपयोग बढ़ाना तथा 'ग्रुप इनसॉलवेंसी' और सीमा पार ऋण शोधन अक्षमता के मामलों के समाधान का प्रावधान करना है।

वित्त मंत्री ने दिवाला प्रक्रिया में ऋण की तुलना में वसूली बहुत कम होने के सवालाें पर साफ किया कि वसूली संपत्ति की गुणवत्ता संबंधित फर्म और उसकी स्थिति पर निर्भर करती है। फिर भी इस प्रक्रिया के तहत मामले के समाधान प्रक्रिया में दाखिल होने के समय संपत्ति के उचित मूल्य के 94.95 प्रतिशत के बराबर धन की वसूली हुई है। पिछले वर्ष के अंत तक 1,376 मामलों में एक-एक लाख करोड़ रुपये की वसूली हुई है।

वित्त मंत्री ने कहा कि 32 हजार से अधिक ऐसे मामले हैं जिनमें प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही बैंकों और ऋणदाताओं ने 14.62 लाख करोड़ रुपये का भुगतान प्राप्त किया। उन्होंने रियल एस्टेट क्षेत्र के संबंध में कहा कि यह कानून किसी क्षेत्र विशेष के लिए नहीं बनाया गया है, लेकिन फिर भी मकान खरीददारों के हित में इस क्षेत्र की कंपनियों के मामलों के निपटान के लिए ऋणदाता समिति को इन संशोधनों के जरिये बैठक में बुलाने का अधिकार दिया जा रहा है ताकि वे भूमि संबंधी मामलों पर उनकी जानकारी हासिल कर सकें। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र के 565 मामले दर्ज किये गये हैं जिनमें 111 मामले हल हो चुके हैं जिनमें डेढ़ लाख से अधिक लोगों को राहत मिली है, 210 मामले लंबित हैं। इनमें 87 मामलों की समाधान योजना तैयार है और उस पर स्वीकृति का इंतजार है।

लोकसभा में सोमवार को पारित इस विधेयक पर राज्यसभा में चर्चा शुरू करते हुए कांग्रेस के राजीव शुक्ला ने कहा कि इस कानून का उद्येश्य अच्छा था लेकिन आज यह जिस तरह लागू हो रहा है वह अपने-आप में एक बड़ा घोटाला बनता जा रहा है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय कंपनी लॉ ट्राइब्यूनल (एनसीएलटी) की प्रक्रिया में 40 रुपये की सम्पत्ति वाली कंपनी 'हेयरकट' में चार रुपये में दूसरे को सौंप दी जा रही है।

भाजपा के राधामोहन अग्रवाल ने दिवाला प्रक्रिया में सम्पत्तियों को कम मूल्य पर बेचे जाने के आरोप को आंकड़ों के साथ खंडित करते हुए कहा कि सितंबर 2025 तक जिन ऋणग्रस्त परिसम्पत्तियों (कंपनियों) का समाधान हुआ है उनमें औसत धन की वसूली परिसमापन मूल्य के 170 प्रतिशत और उचित मूल्य के 93 प्रतिशत के बराबर है।

बीजद के निरंजन बिशी ने कहा कि कहा कि दिवाला संहिता आवश्यक है, लेकिन सवाल यह है कि यह किसके हित में है। उन्होंने कहा कि किसानों को दिवाला प्रक्रिया में संरक्षण मिलना चाहिये। गरीबों, आदिवासियों की सम्पत्ति की रक्षा के पर्याप्त प्रावधान होने चाहिये। दिवाला समाधान प्रक्रिया में मानवीय दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिये। उन्होंने कमजोरों को मुफ्त कानूनी सहायता दिये जाने का भी सुझाव दिया।

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