कोलकाता , सितंबर 20 -- पश्चिम बंगाल के पूर्व कुलपतियों, प्रोफेसरों और वरिष्ठ शोधकर्ताओं समेत दिग्गज शिक्षाविदों के एक समूह ने राज्य के राज्यपाल आरएन रवि से 'पश्चिम बंगाल विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय (प्रशासन और विनियमन) (संशोधन) विधेयक, 2026' को मंजूरी न देने का आग्रह किया है।

उनका तर्क है कि शिक्षण और गैर-शिक्षण कर्मचारियों के प्रस्तावित अंतर-विश्वविद्यालय स्थानांतरण से शैक्षणिक स्वायत्तता को नुकसान पहुंचेगा और शोध व अध्यापन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

पश्चिम बंगाल विधानसभा से 10 सितंबर को पारित यह विधेयक राज्य सरकार को राज्य-सहायता प्राप्त विश्वविद्यालयों के बीच कर्मचारियों के तबादले का अधिकार देता है। शिक्षाविदों ने राज्यपाल को लिखे पत्र में इस कानून पर शैक्षणिक और प्रक्रियात्मक, दोनों तरह की चिंताएं जतायी हैं।

प्रस्तावित संशोधन के तहत, कुलाधिपति राज्य सरकार के परामर्श से प्रशासनिक कारणों का हवाला देकर राज्य-सहायता प्राप्त विश्वविद्यालयों के बीच कर्मचारियों का तबादला कर सकते हैं। दूसरे विश्वविद्यालय में स्थानांतरित कर्मचारी अपने मूल संस्थान में अपना पूर्वाधिकार बरकरार रख सकते हैं या नये विश्वविद्यालय में स्थायी संविलयन का विकल्प चुन सकते हैं।

पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों का तर्क है कि प्रत्येक विश्वविद्यालय का अपना शैक्षणिक ढांचा, पाठ्यक्रम और शोध प्राथमिकताएं होती हैं और वे उसी के अनुसार शिक्षकों की नियुक्ति करते हैं।

उन्होंने कहा कि संस्थानों के बीच शिक्षकों के तबादले से अध्यापन कार्यक्रमों, शोध परियोजनाओं और दोनों विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के संतुलन में बाधा आ सकती है। उन्होंने शोधार्थियों पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव की ओर भी इशारा किया। उनका कहना है कि विशेष विशेषज्ञता वाले शिक्षक अक्सर छात्रों को आकर्षित करते हैं और विशिष्ट क्षेत्रों के आधार पर विकसित प्रयोगशालाएं व पुस्तकालय उनका आधार होते हैं।

शिक्षाविदों ने पुराने विश्वविद्यालयों में खाली पदों का मुद्दा उठाते हुए तर्क दिया कि वर्तमान शिक्षकों के तबादले से उन संस्थानों को और नुकसान पहुंचेगा, जो पहले से ही मानव और भौतिक संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं।

शिक्षाविदों के अनुसार, ऐसे शिक्षकों के स्थानांतरण से शोधार्थी उचित मार्गदर्शन से वंचित हो सकते हैं, जबकि मूल संस्थान की सुविधाएं अनुपयोगी पड़ी रह सकती हैं। पत्र में यह चेतावनी भी दी गयी है कि बड़े शोध अनुदान अक्सर विशिष्ट मुख्य शोधकर्ताओं की मौजूदगी से जुड़े होते हैं। मुख्य शिक्षकों के तबादले की स्थिति में अंतर-विषयक और बहु-संस्थानी परियोजनाएं विशेष रूप से प्रभावित हो सकती हैं। उन्होंने कहा कि नये विश्वविद्यालयों को तबादलों के बजाय नियोजित नियुक्तियों और पर्याप्त धन के जरिये मजबूत बनाया जाना चाहिए।

शैक्षणिक स्वायत्तता पर शिक्षाविदों ने लिखा, "ऐसा कोई भी कदम शैक्षणिक स्वायत्तता को पूरी तरह खत्म कर देगा। सभी विश्वविद्यालय केंद्रीयकृत प्रशासनिक नियंत्रण के अधीन आ जायेंगे और वे अपनी स्वाभाविक दिशा के अनुसार स्वतंत्र रूप से आगे नहीं बढ़ पायेंगे।" उन्होंने कहा कि यदि शिक्षकों को यह लगेगा कि अपने शैक्षणिक मामलों पर उनका नियंत्रण नहीं रहा, तो इससे शैक्षणिक कामकाज प्रभावित हो सकता है।

पत्र में मूल रूप से गैर-स्थानांतरणीय पदों पर नियुक्त कर्मचारियों के तबादले पर कानूनी व प्रशासनिक सवाल उठाये गये हैं, साथ ही अलग-अलग विश्वविद्यालयों की सेवा शर्तों में सामंजस्य बैठाने की व्यावहारिक कठिनाइयों की ओर भी ध्यान दिलाया गया है।

अपनी अपील का समापन करते हुए शिक्षाविदों ने लिखा, "संक्षेप में, हमारा यह दृढ़ मत है कि यदि यह बदलाव लागू होता है तो इससे नये संस्थानों को कोई ठोस लाभ मिले बिना पुराने और स्थापित विश्वविद्यालयों का कामकाज गंभीर रूप से प्रभावित होगा।"उन्होंने राज्यपाल से अपनी चिंताओं पर विचार करने और 'विधेयक को अपनी सहमति न देने' का आग्रह किया।

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