शाहिद के. अब्बास सेनयी दिल्ली , मार्च 12 -- महात्मा गांधी ने अनुयायियों के एक छोटे समूह के साथ साबरमती आश्रम से एक सरल लेकिन क्रांतिकारी योजना को ध्यान में रखते हुए आज ही के दिन यानि 12 मार्च (1930) को दांडी की ओर पैदल यात्रा शुरू की थी। 78 स्वयंसेवकों के साथ शुरू हुई यह यात्रा धीरे-धीरे एक ऐसे बवंडर में बदल गयी जिसने ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंका।

नमक जैसी रोजमर्रा इस्तेमाल होने वाली साधारण सी वस्तु बनाकर दुनिया की सबसे शक्तिशाली सत्ता को चुनौती देने के लिए शुरू की गयी यह पद यात्रा आधुनिक इतिहास की सबसे शक्तिशाली अवज्ञाओं में से एक बन गयी। भारतीय स्वतंत्रता इतिहास में आज भी यह दिन एक निर्णायक क्षण के रूप में याद किया जाता है।

यह विरोध औपनिवेशिक सरकार के नमक एकाधिकार के खिलाफ था। सरकार के इस एकाधिकार ने न केवल नागरिकों को भारी कर वाला नमक खरीदने के लिए मजबूर कर दिया था, बल्कि वे अपने ही समुद्री तट पर एक मुट्ठी नमक भी इकट्ठा नहीं कर सकते थे।

गांधी जी के लिए यह मुद्दा औपनिवेशिक शासन के रोजमर्रा के अन्यायों का प्रतीक था। मार्च से कुछ दिन पहले उन्होंने लॉर्ड इरविन को लिखे एक पत्र में चेतावनी दी थी कि यदि ब्रिटिश सरकार भारतीय लोगों की शिकायतों का समाधान नहीं करती है, तो यह अभियान शुरू हो जाएगा।

सरकार की तरफ से सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिलने के बाद उन्होंने लिखा, "घुटने टेककर मैंने रोटी मांगी थी और बदले में मुझे पत्थर मिला।" और इसी के साथ उन्होंने अपने अहिंसक आंदोलन को शुरू कर दिया।

यह यात्रा देशव्यापी सविनय अवज्ञा और 'नमक सत्याग्रह' की शुरुआत थी। गांधी जी और 78 स्वयंसेवकों ने साबरमती आश्रम से यात्रा शुरू की और गुजरात के गांवों से होते हुए लगभग 390 किलोमीटर की दूरी तय की। हर दिन धूल भरी सड़कों पर भीड़ जमा होती थी, यात्रियों का स्वागत करती, समर्थन देती और गांधी जी को स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता के बारे में बोलते हुए सुनती थी।

एक छोटे से जुलूस के साथ शुरू हुआ अभियान धीरे-धीरे एक जन आंदोलन में बदल गया। इस अभियान के मूल में गांधी जी का अहिंसक प्रतिरोध का दर्शन था, जो सत्याग्रह के सिद्धांत पर आधारित था कि सत्य और नैतिक साहस अन्यायपूर्ण सत्ता को चुनौती दे सकते हैं। गांधी जी ने इस मार्च के दौरान समर्थकों से कहा था, "हम अंग्रेजों को नष्ट करने के लिए नहीं निकले हैं, लेकिन हम उनके शोषण की व्यवस्था को नष्ट करने के लिए दृढ़ संकल्पित हैं।"प्रदर्शनकारी 24 दिनों की पदयात्रा के बाद छह अप्रैल, 1930 को दांडी में अरब सागर के तट पर पहुँचे। गांधी जी तट पर झुके, किनारे से नमक युक्त मिट्टी का एक ढेला उठाया और घोषणा की कि उन्होंने ब्रिटिश नमक कानून तोड़ दिया है। यह भाव सरल था लेकिन बिजली की तरह कौंधने वाला था। इसने करोड़ों भारतीयों को औपनिवेशिक एकाधिकार की अवहेलना करने के लिए आमंत्रित किया।

इसकी प्रतिक्रिया त्वरित और व्यापक थी। पूरे भारत में लोगों ने अवैध रूप से नमक बनाना शुरू कर दिया, ब्रिटिश सामानों का बहिष्कार किया और शांतिपूर्ण प्रदर्शन किए। बड़ी संख्या में महिलाएं इस आंदोलन में शामिल हुईं, जबकि छात्रों, श्रमिकों और किसानों ने प्रदर्शनों में भाग लिया। औपनिवेशिक सरकार ने बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियों के साथ जवाब दिया, गांधी जी सहित दसियों हज़ार लोगों को हिरासत में लिया गया।

यह मार्च व्यापक भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में एक महत्वपूर्ण मोड़ बन गया। इसने स्वतंत्रता संग्राम को राजनीतिक अभियान से बदलकर एक जन आंदोलन में बदल दिया। अंतरराष्ट्रीय समाचार पत्रों ने गिरफ्तारी और हिंसा का सामना कर रहे शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की तस्वीरें और रिपोर्ट प्रकाशित कीं, जिससे भारत की स्वशासन की मांग की ओर दुनिया का ध्यान गया।

इतिहासकार अक्सर दांडी मार्च को 20वीं सदी के सबसे प्रभावशाली नागरिक प्रतिरोधों में से एक के रूप में वर्णित करते हैं। अमीर और गरीब दोनों की समान जरूरत वाले नमक को चुनकर गांधी जी ने एक रोजमर्रा की वस्तु को स्वतंत्रता के शक्तिशाली प्रतीक में बदल दिया। इस मार्च ने तुरंत औपनिवेशिक शासन को समाप्त नहीं किया, लेकिन इसने स्वतंत्रता आंदोलन की गतिशीलता को मौलिक रूप से बदल दिया और भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के नैतिक आधार को कमजोर कर दिया।

लगभग एक सदी बाद, साबरमती से दांडी तक की यात्रा राष्ट्र की स्मृति में अंकित है। 12 मार्च, 1930 को शुरू हुई उस यात्रा ने एक शक्तिशाली संदेश दिया- अहिंसक प्रतिरोध दुनिया के सबसे शक्तिशाली साम्राज्य को भी चुनौती दे सकता है।

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