होशियारपुर , अगस्त 11 -- दल खालसा ने मंगलवार को घोषणा की कि वह केंद्र सरकार की ओर से पंजाब के कथित 'दमन और अधीनता' के विरोध में 15 अगस्त को पूरे पंजाब में 'काला दिवस' मनाएगा।

संगठन ने एक बार फिर स्वतंत्र और संप्रभु पंजाब की मांग दोहरायी है। संगठन के कार्यक्रम के तहत स्वतंत्रता दिवस से एक दिन पहले 14 अगस्त को होशियारपुर में काले झंडों के साथ प्रदर्शन किया जाएगा। दल खालसा के अनुसार, मार्च रेलवे रोड स्थित गुरुद्वारा सिंह सभा से शुरू होकर अंबेडकर चौक तक जाएगा।

कार्यक्रम की घोषणा करते हुए दल खालसा के कार्यकारी अध्यक्ष परमजीत सिंह मंड ने कहा कि संगठन का यह कार्यक्रम पंजाब को भारत के 'हर प्रकार के वर्चस्व' से मुक्त कराने की उसकी मांग को दोहराएगा। उन्होंने आरोप लगाया कि स्वतंत्रता के करीब आठ दशक बाद भी भारतीय राज्य पंजाब को समानता और निष्पक्षता के बजाय संदेह की दृष्टि से देखता है। उन्होंने दावा किया कि 'सिख सवाल' अब भी अनसुलझा है तथा पंजाब के लोगों के राजनीतिक, सांस्कृतिक और नागरिक अधिकारों के समक्ष खतरे बने हुए हैं।

दल खालसा ने इस वर्ष के कार्यक्रम के लिए मुख्य रूप से तीन मुद्दों को उठाने की घोषणा की है। इनमें 'वंदे मातरम्' का गायन अनिवार्य किए जाने का विरोध, पंजाब में कथित जनसांख्यिकीय बदलाव और पुलिस एवं सुरक्षा प्रतिष्ठान के कुछ हिस्सों पर लगाए गए कथित मानवाधिकार उल्लंघनों के आरोप शामिल हैं। 'वंदे मातरम्' के मुद्दे पर मंड ने कहा कि किसी राष्ट्रीय गीत का अनिवार्य गायन राज्य द्वारा स्वीकृत सांस्कृतिक प्रतीक को थोपने के समान होगा। उन्होंने दावा किया कि इससे व्यक्ति की अंतरात्मा की स्वतंत्रता और भारतीय समाज के बहुलतावादी चरित्र पर असर पड़ सकता है।

दल खालसा ने पंजाब में कथित तौर पर हो रहे 'जानबूझकर जनसांख्यिकीय बदलाव' को लेकर भी चिंता जताई।

संगठन ने मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान के कथित उस बयान का हवाला दिया, जिसमें प्रवासी परिवारों को तीन लाख से अधिक राशन कार्ड जारी किए जाने की बात कही गयी थी।

मंड ने आरोप लगाया कि इस तरह के कदम पंजाब के जनसांख्यिकीय संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि पंजाब केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि सिखों की ऐतिहासिक मातृभूमि है और संगठन ऐसी नीतियों का अभियानों के माध्यम से विरोध करेगा।

दल खालसा ने फिल्म 'सतलुज' को लेकर हाल में हुई सार्वजनिक बहस का भी उल्लेख किया। संगठन ने कहा कि फिल्म के मुद्दे ने पंजाब में पुलिस और सुरक्षा बलों के कुछ हिस्सों पर लगाए गए कथित ज्यादती, गुमशुदगी और न्याय से वंचित किये जाने के आरोपों को फिर चर्चा में ला दिया है।

संगठन ने आरोप लगाया कि गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों के आरोपी कुछ लोगों को कथित तौर पर दंड से बचने का लाभ मिला और ऐसे मामलों में जवाबदेही तय किये जाने की जरूरत है। दल खालसा ने 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) द्वारा कथित तौर पर पैलेट गन के इस्तेमाल की भी आलोचना की।

संगठन ने इसे अत्यधिक भीड़ नियंत्रण उपाय बताते हुए कहा कि पैलेट गन से स्थायी चोट लग सकती है। श्री सिंह ने कहा कि भीड़ नियंत्रण के नाम पर प्रदर्शनकारियों को स्थायी विकलांगता या आंखों की रोशनी खोने का खतरा नहीं होना चाहिए।

दल खालसा के आयोजन सचिव परमजीत सिंह टांडा ने कहा कि संगठन द्वारा उठाये गये तीनों मुद्दे आपस में जुड़े हुए हैं और उनके अनुसार ये "सांस्कृतिक थोपने, जनसांख्यिकीय हेरफेर और राजनीतिक दमन" की व्यापक नीति को दर्शाते हैं। उन्होंने प्रस्तावित प्रदर्शन को पंजाब की पहचान और सिखों की विशिष्ट स्थिति को प्रभावित करने वाली नीतियों के खिलाफ शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक विरोध बताया।

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