दरभंगा , दिसम्बर 18 -- ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के स्नातकोत्तर संस्कृत विभाग, लोकभाषा प्रचार समिति, बिहार प्रान्त एवं डॉ. प्रभात दास फाउंडेशन, दरभंगा के संयुक्त देखरेख में में पांच दिवसीय संस्कृत संभाषण शिविर गुरुवार को शुरू हुआ।
स्नातकोतर संस्कृत विभाग में अध्यक्ष डॉ. कृष्णकान्त झा की अध्यक्षता में आयोजित सत्र में आज सीएमबी कॉलेज, घोघरडीया के प्रधानाचार्य प्रो. जीवानन्द झा, संस्कृत विश्वविद्यालय के दर्शन-विभागाध्यक्ष डॉ. धीरज कुमार पांडेय, सीएम कॉलेज, दरभंगा के संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ.संजीत कुमार झा, विभागीय प्राध्यापिका डॉ.ममता स्नेही, संस्कृत अध्ययन केन्द्र के अधिकारी डॉ. आर एन चौरसिया ने हिस्सा लिया। इस कार्यक्रम का संचालन अमित कुमार झा ने किया।
संस्कृत संभाषण शिविर को संबोधित करते हुए प्रो. जीवानन्द झा ने कहा कि शिविरों के आयोजन से संस्कृत अध्ययन-अध्यापन में लोगों की रुचि बढ़ेगी। यदि 10- 20 प्रतिशत छात्र भी संस्कृत बोलना सीखेंगे तो यह शिविर सफल माना जाएगा। उन्होंने छात्रों से संस्कृत भाषा में संवाद करने, लिखने, पढ़ने तथा समझने का आह्वान करते हुए कहा कि संस्कृत पढ़ने वाले एवं बोलने वाले व्यक्ति कभी भी, कहीं भी भूखे नहीं रह सकते हैं।
मुख्य अतिथि डॉ. धीरज कुमार पांडेय ने संभाषण शिविर के लिये छात्रों की उपस्थिति पर हर्ष व्यक्त करते हुए कहा कि संस्कृत सबसे प्राचीन एवं अन्य भाषाओं की जननी है। संस्कृत आदिकाल का हमारा इतिहास भी है और मूल्यपरक भाषा भी। उन्होंने कहा कि संस्कृत में मानवीय सम्मान, आचरण एवं मानवीय गुणों आदि का विस्तृत वर्णन है। इसमें मूल्य का संरक्षण किया गया है।
मुख्य वक्ता डॉ. संजीत कुमार झा ने कहा कि संस्कृत में बोलना छात्रों एवं शिक्षकों के लिए सम्मान की बात है। इसमें निहित ज्ञान के कारण ही आज संस्कृत की प्रासंगिकता पुनः बढ़ रही है। संस्कृत बोलने से छात्रों का आत्मबल बढ़ता है। उन्होंने निरंतर अभ्यास कर संस्कृत संभाषण सीखने का आह्वान करते हुए कहा कि संस्कृत परिवर्तन का वाहक है। छात्र ही शिक्षकों का वास्तविक परिचय होता है।
अध्यक्षीय संबोधन में डॉ. कृष्णकान्त झा ने कहा कि देवभाषा कही जाने वाली संस्कृत प्राचीन काल में लोकभाषा थी। विदेशी आक्रमण के कारण इसका काफी क्षय हुआ। कई उदाहरण देते हुए कहा कि आज बहुत से मुस्लिम लोग भी संस्कृत में संभाषण करते हैं। संस्कृत की उन्नति एवं लोकप्रियता दिनानुदिन पुनः बढ़ती जा रही है। संस्कृत सीखने से अन्य भाषाएं भी जल्दी सीखी जा सकती है। उन्होंने छात्रों से संस्कृत में आवेदन लिखने का आह्वान करते हुए कहा कि संस्कृत बहुत कठिन भाषा नहीं है, पर व्यवहार में न होने के कारण लोग इसका प्रयोग नहीं कर पाते हैं। संस्कृत बोलने के लिए व्याकरण या शास्त्रीय ज्ञान आवश्यक नहीं है, बल्कि निरंतर अभ्यास की जरूरत है।
धन्यवाद ज्ञापन करते हुए डॉ. आर एन चौरसिया ने संस्कृत ग्रंथों में वर्णित सिद्धांतों को बेहतरीन जीवनशैली बताते हुए कहा कि शिविर में संकेतों, चित्रों, वस्तुओं, उदाहरणों, प्रश्नोत्तरों तथा वार्तालापों आदि के माध्यम से सरल संस्कृत संभाषण सिखाया जाएगा। शिविर में किसी भी उम्र के, कोई भी छात्र-छात्रा या पुरुष-महिला निःशुल्क रूप से भाग ले सकते हैं।
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