नयी दिल्ली , जुलाई 14 -- भारत ने दक्षिण चीन सागर पर अपना रूख स्पष्ट करते हुए कहा है कि वह इस क्षेत्र में संयुक्त राष्ट्र के अंतर्राष्ट्रीय नियमों के आधार पर नौवहन और उड़ान की स्वतंत्रता, बिना रूकावट के व्यापार और समुद्री विवादों के समाधान का पक्षधर है।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने मंगलवार को यहां साप्ताहिक मीडिया ब्रीफिंग में सवालों के जवाब में कहा कि दक्षिण चीन सागर के मुद्दे पर भारत का रूख पूरी तरह स्पष्ट है। भारत का शुरू से ही मानना है कि 'समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन' के अंतर्राष्ट्रीय नियमों का पालन होना चाहिए तथा इसी के नियमों के अनुरूप समुद्री विवादों का समाधान किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा, "दक्षिण चीन सागर मुद्दे पर भारत का रुख जग-जाहिर है। हम 'समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन' में दर्शाए गए अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुरूप, नौवहन और उड़ान की स्वतंत्रता, समुद्र के अन्य कानूनी उपयोगों और बिना रुकावट के व्यापार को बनाए रखने के महत्व पर जोर देते हैं। हम इस बात की एक बार और पुष्टि करते हैं कि समुद्री विवादों को शांतिपूर्ण ढंग से और अंतर्राष्ट्रीय नियमों के अनुसार सुलझाया जाना चाहिए।"प्रवक्ता ने कहा कि इस मामले में मध्यस्थता न्यायाधिकरण का फैसला महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।

श्री जायसवाल ने कहा , " हम यह दोहराते हैं कि दस साल पहले मध्यस्थता न्यायाधिकरण द्वारा सुनाया गया फैसला एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है और यह संबंधित पक्षों के बीच विवादों को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने का आधार है।"दक्षिण चीन सागर मुद्दे पर 'समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन' के अंतर्गत बने न्यायाधिकरण के 12 जुलाई, 2016 के फ़ैसले की दसवीं वर्षगांठ पर भारत के इस रूख को स्पष्ट किया जाना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

इसी फैसले के आधार पर अमेरिका, ब्रिटेन और दस से अधिक अन्य पश्चिमी तथा एशियाई देशों ने रविवार को एक बार फिर कहा कि न्यायाधिकरण के फ़ैसले के आधार पर दक्षिण चीन सागर में चीन के बड़े-बड़े दावे गैर-कानूनी हैं।

इन देशों ने एक संयुक्त बयान में कहा है कि उन्होंने विवादित समुद्री इलाकों में "अस्थिरता पैदा करने वाली" उन गतिविधियों को खारिज कर दिया है जो क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा हैं। कुल 27 देशों वाले यूरोपीय संघ ने एक अलग बयान जारी कर इस फ़ैसले को "विवादों के शांतिपूर्ण समाधान में एक ऐतिहासिक फ़ैसला" बताते हुए इसका एक बार फिर समर्थन किया है।

अमेरिका और जापान समेत 14 देशों के एक समूह ने हाल ही में 2016 के फ़ैसले को फिर से सही ठहराया और कहा कि दक्षिण चीन सागर में चीन के व्यापक दावों का अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत कोई कानूनी आधार नहीं है।

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