दंतेवाड़ा/रायपुर , जून 08 -- छत्तीसगढ़ सरकार किसानों की आय बढ़ाने, मिट्टी की उर्वरता संरक्षित करने तथा प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से दंतेवाड़ा जिले में 'खेत बचाओ अभियान' शुरू करेगी।

यह जानकारी आज विभाग ने दी। अभियान के तहत प्राकृतिक खेती, मिलेट्स उत्पादन, पारंपरिक बीज संरक्षण और जल संरक्षण पर विशेष जोर दिया जाएगा।

कृषि विभाग द्वारा तैयार कार्ययोजना के अनुसार अभियान को जिले के चारों विकासखंडों में चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाएगा। इसके तहत रागी (मड़िया), कोदो, कुटकी, ज्वार और बाजरा जैसी मिलेट्स फसलों को बढ़ावा दिया जाएगा, जिन्हें 'श्री अन्न' और सुपरफूड के रूप में मान्यता प्राप्त है। ये फसलें कम पानी और कम लागत में उत्पादन योग्य होने के साथ-साथ सूखा-रोधी भी हैं।

अभियान का मुख्य उद्देश्य कृषि भूमि की उर्वरता बनाए रखना, किसानों की लागत कम करना, प्राकृतिक कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देना तथा मिट्टी और जल संरक्षण को जन-आंदोलन का स्वरूप देना है। इसके माध्यम से किसानों को रासायनिक खेती से धीरे-धीरे प्राकृतिक एवं जैविक खेती की ओर प्रेरित किया जाएगा।

योजना के क्रियान्वयन के लिए पांच चरण निर्धारित किए गए हैं। पहले चरण में मृदा स्वास्थ्य मैपिंग और सॉयल हेल्थ कार्ड व्यवस्था को मजबूत किया जाएगा। दूसरे चरण में मिलेट्स एवं स्थानीय फसलों के उत्पादन को प्रोत्साहन दिया जाएगा। तीसरे चरण में किसानों को जैविक खाद, ब्लू-ग्रीन एल्गी और वर्मी कम्पोस्ट उत्पादन का प्रशिक्षण दिया जाएगा। चौथे चरण में सामुदायिक बीज बैंक और पारंपरिक बीज मंडियों की स्थापना की जाएगी, जबकि अंतिम चरण में खेतों की मेड़ों पर हरित खाद देने वाले पौधों का रोपण किया जाएगा। अभियान के तहत एक लाख पौधों के वितरण एवं रोपण का लक्ष्य रखा गया है।

वित्तीय वर्ष 2025-26 में जिले की 135 ग्राम पंचायतों को इस अभियान से जोड़ा जाएगा। इसके तहत 4,600 हेक्टेयर क्षेत्र में प्राकृतिक खेती और 4,300 हेक्टेयर क्षेत्र में मिलेट्स उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। साथ ही 40 सामुदायिक बीज बैंक स्थापित किए जाएंगे।

कृषि विभाग के अनुसार अभियान के सफल क्रियान्वयन से अगले तीन वर्षों में मिट्टी के जैविक कार्बन स्तर में वृद्धि होने की संभावना है। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर निर्भरता घटने से किसानों की उत्पादन लागत में 35 से 40 प्रतिशत तक कमी आ सकती है। साथ ही दंतेवाड़ा में उत्पादित मिलेट्स को राष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाने के नए अवसर भी विकसित होंगे।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल केवल खेती की पद्धति में बदलाव नहीं बल्कि मिट्टी, जल, जैव विविधता और किसानों की आजीविका को सुरक्षित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है। निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति होने पर दंतेवाड़ा प्राकृतिक एवं टिकाऊ कृषि मॉडल के रूप में प्रदेश के लिए उदाहरण बन सकता है।

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