अगरतला , नवंबर 02 -- त्रिपुरा ट्राइबल कस्टमरी लॉ को-ऑर्डिनेशन कमेटी ने लंबित 14 पारंपरिक कानून विधेयकों के शीघ्र संहिताकरण की मांग को लेकर सात दिसंबर को अगरतला में तीन घंटे का धरना देने की घोषणा की है।
यह निर्णय रविवार को आयोजित एक बैठक में लिया गया, जिसमें विभिन्न आदिवासी समुदायों के प्रतिनिधियों, सामुदायिक नेताओं और पारंपरिक मुखिया ने हिस्सा लिया। बैठक में सभी ने इस मुद्दे पर चिंता जताते हुए आंदोलन की आवश्यकता पर सहमति व्यक्त की।
समिति के संयुक्त संयोजक बीरेंद्र त्रिपुरा ने बताया कि धरना दोपहर 12 बजे शहर में महात्मा गांधी की प्रतिमा के पास शुरू होगा और तीन घंटे तक चलेगा। उन्होंने 14 पारंपरिक कानून विधेयकों के संहिताकरण की प्रक्रिया में हो रही देरी पर चिंता जताई। इन सभी विधेयकों को त्रिपुरा जनजातीय क्षेत्र स्वायत्त जिला परिषद (टीटीएएडीसी) ने 28 दिसंबर, 2022 को सर्वसम्मति से पारित किया था।
ये प्रस्तावित कानून राज्य में रहने वाले मूलनिवासी समुदायों के विवाह, उत्तराधिकार, गोद लेने और अन्य व्यक्तिगत एवं सामाजिक मामलों से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं को नियंत्रित करने के लिए आवश्यक हैं।
श्री त्रिपुरा ने कहा कि परिषद द्वारा इन विधेयकों को मंजूरी दिए लगभग चार वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन संहिताकरण की प्रक्रिया अब तक पूरी नहीं हुई है। इससे आदिवासी समुदायों में नाराजगी है।
उन्होंने बताया कि 14 विधेयकों में से 10 को राज्य सरकार ने कुछ टिप्पणियों और संशोधन संबंधी सिफारिशों के साथ स्वायत्त जिला परिषद प्रशासन को लौटा दिया है। ये विधेयक अब परिषद के पास लंबित हैं, जबकि शेष चार विधेयक राज्य सरकार के विचाराधीन हैं।
श्री त्रिपुरा ने कहा कि संगठन ने अपने पारंपरिक कानूनों को औपचारिक मान्यता देने की मांग को लेकर राज्य सरकार और टीटीएएडीसी प्रशासन के समक्ष कई बार ज्ञापन सौंपे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि लगातार अपील के बावजूद उनकी मांगों पर कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है।
उन्होंने बताया कि समिति के प्रतिनिधिमंडल ने स्वायत्त जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी सदस्य और मुख्यमंत्री डॉ. माणिक साहा से भी मुलाकात की थी। दोनों ने प्रतिनिधियों को आश्वासन दिया था कि उनकी चिंताओं पर उचित समय में ध्यान दिया जाएगा। समिति का मानना है कि इन आश्वासनों के बाद भी कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है।
सात दिसंबर को प्रस्तावित धरने का उद्देश्य लंबित विधेयकों की ओर फिर से ध्यान आकर्षित करना और इस मुद्दे का शीघ्र समाधान सुनिश्चित करने की मांग करना है। बीरेंद्र त्रिपुरा ने कहा कि यदि उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया तो संगठन आंदोलन तेज कर सकता है, जिसमें राज्यव्यापी बंद भी शामिल हो सकता है।
उन्होंने कहा कि पारंपरिक कानून मूलनिवासी समुदायों की विशिष्ट पहचान और पारंपरिक संस्थाओं को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। त्रिपुरा में 19 अलग-अलग आदिवासी समुदाय रहते हैं और प्रत्येक की अपनी विशिष्ट परंपराएं हैं, जिनके तहत व्यक्तिगत एवं सामाजिक मामले संचालित होते हैं।
उन्होंने कहा कि अब तक जमातिया होडा के अलावा किसी अन्य समुदाय के पारंपरिक कानून का संहिताकरण नहीं हो पाया है, जबकि समुदायों के बुजुर्ग और नेता इसके लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं।
समिति का मानना है कि पारंपरिक कानूनों के संहिताकरण से न केवल मूलनिवासी परंपराओं का संरक्षण होगा, बल्कि समुदायों में प्रचलित स्थापित प्रथाओं को कानूनी मान्यता भी मिलेगी।
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