अगरतला , अक्टूबर 20 -- त्रिुपरा में दुर्गा पूजा की महानवमी की रस्मों के तहत मंगलवार को राजधानी के दुर्गाबाड़ी मंदिर में एक भैंसे और कई बकरों की बलि दी गई।

मंत्रोच्चार के बीच 150 साल पुरानी इस परंपरा को निभाया गया। मंदिर के पुजारी जयंत भट्टाचार्य ने बताया कि उच्चतम न्यायालय के निर्देश का पालन करते हुए बलि की जगह को आम लोगों की नज़रों से छिपाकर रखा गया था।

उन्होंने कहा कि महानवमी पर देवी दुर्गा के सामने जानवरों की बलि देने की परंपरा सदियों पुरानी है और यह राज्य द्वारा संचालित इस मंदिर की पूजा-अर्चना का एक अहम हिस्सा है। उन्होंने दावा किया कि जानवरों की बलि के बिना देवी दुर्गा की पूजा अधूरी रहेगी। गौरतलब है कि तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजय करोल की अध्यक्षता में 2019 में त्रिपुरा उच्च न्यायालय ने राज्यभर के मंदिरों में जानवरों और पक्षियों की बलि देने पर रोक लगा दी थी। इसमें 500 साल पुराना मां त्रिपुरेश्वरी मंदिर भी शामिल था।

उच्चतम न्यायालय ने एक याचिका पर बाद में सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय के इस फैसले पर रोक लगा दी। मंदिरों में इसके साथ ही जानवरों की बलि देने पर कुछ पाबंदियां भी लगाईं क्योंकि यह 1949 में भारतीय संघ के साथ त्रिपुरा के विलय समझौते का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था।

श्री भट्टाचार्य ने बताया कि कल दशमी के दिन मंदिर में पुलिस देवी दुर्गा को 'गार्ड ऑफ ऑनर' देगी। इसके बाद पवित्र कलश को उज्जयंत पैलेस ले जाया जाएगा, जहां पूर्व शाही परिवार देवी को विदाई देगा। मंदिर के प्रभारी प्रदीप देबनाथ ने बताया कि यहां देवी दुर्गा के लिए कोई तय शाकाहारी या मांसाहारी सूची नहीं है। उन्होंने समझाया कि भक्त जो भी दान करते हैं या बलि देते हैं, वही देवी दुर्गा को अर्पित किया जाता है और यहां मांस या मछली चढ़ाने पर कोई रोक नहीं है।

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