कोलकाता , मई 20 -- पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में मिली करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस ने बुधवार को अपना पहला बड़ा विरोध प्रदर्शन किया।

विधानसभा परिसर में बी. आर. अंबेडकर की मूर्ति के पास आयोजित इस धरने में पार्टी के 80 विधायकों में से करीब 35 विधायक शामिल हुए। पार्टी का यह प्रदर्शन चुनाव के बाद हुई कथित हिंसा, लोगों को हटाए जाने के अभियान और बुलडोज़र की कार्रवाई के खिलाफ था।

यह प्रदर्शन अपनी मांग से ज्यादा पार्टी के उन विधायकों के लिए चर्चा में रहा जो इससे गायब रहे। पंद्रह साल बाद सत्ता से बाहर होकर विपक्ष में बैठी तृणमूल कांग्रेस के अंदर की गुटबाजी और बेचैनी इस धरने में साफ देखने को मिली। प्रदर्शन में शोभनदेव चट्टोपाध्याय, कुणाल घोष, नयना बनर्जी और ऋतब्रत बनर्जी जैसे वरिष्ठ नेता तो मौजूद थे, लेकिन आधे से ज्यादा विधायकों की गैरमौजूदगी ने सियासी गलियारों में अटकलें तेज कर दी हैं। यह बात इसलिए भी ज्यादा अहम है क्योंकि एक दिन पहले ही दक्षिण कोलकाता के कालीघाट में पार्टी की एक बड़ी बैठक हुई थी, जिसमें नेताओं ने फिर से सड़कों पर उतरकर राजनीति करने पर जोर दिया था।

आंदोलनों और जन-आंदोलनों के दम पर खड़ी होने वाली पार्टी के लिए यह स्थिति चिंताजनक है। सिंगूर और नंदीग्राम में जमीन अधिग्रहण विरोधी आंदोलन से लेकर वामपंथियों के खिलाफ लंबे अभियानों तक, तृणमूल कांग्रेस की पहचान सड़कों पर संघर्ष करने वाली पार्टी के रूप में रही है, जिसके बाद 2011 में वह सत्ता में आई थी। अब 15 साल तक सरकार चलाने और हालिया चुनाव में मिली हार के बाद, पार्टी के सामने खुद को फिर से एक विपक्षी आंदोलन के रूप में खड़ा करने की बड़ी चुनौती है।

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