चेन्नई , अगस्त 11 -- तमिलनाडु विधानसभा ने मंगलवार को सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार से विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक' (एफसीआरए), 2026 को उसके मौजूदा रूप में संसद में पारित नही कराने का अनुरोध किया है।

विधानसभा ने विधेयक के प्रावधानों पर गहरी चिंता जताते हुए कहा कि इससे धर्मार्थ संगठनों की आजादी और अल्पसंख्यकों की ओर से चलाये जा रहे शिक्षण और कल्याणकारी संस्थानों का कामकाज बुरी तरह प्रभावित होगा। इसलिए सरकार को सभी हितधारकों और राज्य सरकारों से बातचीत के बाद ही आगे बढ़ना चाहिए।

विद्यालय शिक्षा, तमिल विकास, सूचना एवं प्रचार मंत्री राजमोहन ने इस प्रस्ताव को सदन में पेश किया, जिस पर करीब एक घंटे तक चली बहस के बाद सर्वसम्मति से ध्वनि मत से इसे पारित कर दिया गया। बहस के दौरान विभिन्न दलों के सदस्यों ने अपने विचार व्यक्त किये और संशोधन विधेयक के वर्तमान स्वरूप पर कड़ी आपत्ति जतायी।

किसी भी संशोधन में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों, आनुपातिकता, संपत्ति के अधिकारों की सुरक्षा, वैध अपेक्षा और संघवाद को सुनिश्चित किए जाने पर श्री राजामाेहन ने कहा कि विदेशी अंशदान में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के साथ-साथ, कानून के तहत काम करने वाले धर्मार्थ, शैक्षणिक, चिकित्सा, धार्मिक, सांस्कृतिक और समाज कल्याण संगठनों के अधिकारों की रक्षा भी की जानी चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने संशोधन विधेयक को वर्तमान रूप में पारित नहीं करने की मांग की।

उन्होंने कहा कि राज्य विधानसभा एफसीआरए विधेयक, 2026 के वर्तमान स्वरूप में उन प्रावधानों पर गहरी चिंता व्यक्त करती है, जो एफसीआरए पंजीकरण की समय सीमा समाप्त होने, नवीनीकरण न होने, नवीनीकरण से इनकार करने, पंजीकरण रद्द करने या पंजीकरण के समर्पण जैसे आधारों पर धर्मार्थ संगठनों की संपत्तियों को सरकार को हस्तांतरित करने, उनके प्रबंधन, निपटान और बिक्री से संबंधित हैं। श्री राजमोहन ने कहा कि ये प्रावधान धर्मार्थ संगठनों की स्वायत्तता और विशेष रूप से अल्पसंख्यक संचालित शैक्षणिक और समाज कल्याण संस्थानों के कामकाज को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर सकते हैं।

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