चेन्नई , सितंबर 20 -- तमिलनाडु में पलानी के भगवान दंडायुधपाणि मंदिर और मदुरै के मीनाक्षी मंदिर की जमीन से जुड़े विवादों के बाद अब त्रिची के श्रीरंगम में मंदिर की जमीन के एक और कथित फर्जी सौदे का मामला सामने आया है।
इस संबंध में पुलिस ने मुख्य विपक्षी दल द्रमुक के एक प्रमुख पदाधिकारी, एक सब-रजिस्ट्रार और चार अन्य लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया है। जिस जमीन का कथित तौर पर फर्जी तरीके से पंजीकरण कराया गया, वह श्रीरंगम स्थित विश्व प्रसिद्ध भगवान श्री रंगनाथस्वामी मंदिर की थी।
मंदिर के संयुक्त आयुक्त एस. शिवरामकुमार की शिकायत पर त्रिची सिटी क्राइम ब्रांच (सीसीबी) ने पिछले सप्ताह छह लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया। इनमें द्रमुक के श्रीरंगम क्षेत्र सचिव एन. रामकुमार भी शामिल हैं। इन सभी पर 2022-23 में धोखाधड़ी और जमीन से जुड़े फर्जीवाड़े के अलावा आपराधिक साजिश, जालसाजी और अन्य आरोप लगाए गये हैं।
इनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है। इनमें धारा 420 (धोखाधड़ी), 465 (जालसाजी), 467 (मूल्यवान प्रतिभूति या वसीयत आदि की जालसाजी), 468 (धोखाधड़ी के उद्देश्य से जालसाजी), 471 (जाली दस्तावेज या इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को असली बताकर इस्तेमाल करना) और 120-बी (आपराधिक साजिश) शामिल हैं।
कथित तौर पर फर्जी तरीके से हस्तांतरित और पंजीकृत मंदिर की जमीन 7,515 वर्ग फुट है, जिसकी कीमत करीब 50 करोड़ रुपये बताई गयी है। यह जमीन मंदिर नगरी श्रीरंगम में स्थित है और रंगनाथस्वामी मंदिर की 5.87 एकड़ की बड़ी संपत्ति का हिस्सा थी।
पुलिस ने बताया कि विवादित जमीन पर वर्तमान में रामकुमार की अध्यक्षता वाला द्रमुक कार्यालय चल रहा है। पुलिस के अनुसार, जमीन पर अपना मालिकाना हक जताने वाले चार निजी लोगों ने यह जानते हुए भी कि जमीन श्रीरंगम मंदिर की है, फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल कर जमीन का पंजीकरण रामकुमार के नाम कर दिया। कथित जमीन हस्तांतरण में दो करोड़ रुपये से अधिक की राशि शामिल थी।
प्राथमिकी के अनुसार, चेन्नई की पद्मा रंगराजन और बेंगलुरु की विजया कृष्णासामी ने जमीन पर अपना अधिकार होने का दावा करते हुए दिसंबर 2022 में इसे 1.45 करोड़ रुपये में रामकुमार को बेच दिया।
इसके बाद पद्मा रंगराजन के भाई आर. सुंदरराजन और विजया कृष्णासामी ने संपत्ति में अपना हिस्सा होने का दावा किया और 72.5 लाख रुपये प्राप्त करने के बाद रामकुमार के पक्ष में एक बिक्री विलेख कर दिया। बाद में वेंकट वरदन नामक एक अन्य व्यक्ति ने भी संपत्ति में अपना हिस्सा होने का दावा किया और 72.5 लाख रुपये में रामकुमार के पक्ष में एक और बिक्री विलेख कर दिया। प्राथमिकी के अनुसार, इन तीनों लेन-देन में कुल 2.9 करोड़ रुपये की राशि शामिल थी।
पुलिस ने आरोप लगाया है कि आरोपियों को पता था कि संपत्ति मंदिर की है और उन्होंने आपस में मिलीभगत कर निजी मालिकाना हक दिखाने वाले दस्तावेज तैयार किये। आरोप है कि तत्कालीन सब-रजिस्ट्रार ने संपत्ति से जुड़े लेन-देन पर मंदिर प्रशासन की आपत्ति से संबंधित पत्र मिलने के बावजूद बिक्री और सुधार विलेखों का पंजीकरण कर दिया।
उन्होंने कहा कि विवाद पहले से ही मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ में लंबित है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब मामला अदालत में विचाराधीन है तो पुलिस में शिकायत क्यों दर्ज की गई।
इस बीच, तमिलनाडु के हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती (एचआर एंड सीई) मंत्री एस. रमेश ने कहा कि उन्हें लोगों से कई शिकायतें मिली थीं। शिकायतों में कहा गया था कि रामकुमार ने मंदिर की जमीन के एक हिस्से को अवैध तरीके से अपने नाम करा लिया और उसका इस्तेमाल अपने पार्टी कार्यालय के रूप में कर रहा है। उन्होंने कहा कि एचआर एंड सीई विभाग ने मामले की विस्तृत जांच की और सबूत जुटाए। इन सबूतों से यह सामने आया कि जमीन मंदिर की थी।
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