चेन्नई , फरवरी 09 -- तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव संभावित रूप से अप्रैल में होने की अटकलों के बीच कांग्रेस जहां द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) के नेतृत्व वाले गठबंधन से जुड़े रहने के पक्ष में अडिग दिख रही है, वहीं फिल्म अभिनेता से राजनेता बने विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम (टीवीके) अब तक किसी भी राजनीतिक दल का साथ पाने में विफल रही है और उसे अकेले ही चुनावी मैदान में उतरने की स्थिति का सामना करना पड़ रहा है।
विजय ने अक्टूबर 2024 में पार्टी के पहले राज्य सम्मेलन में स्पष्ट किया था कि टीवीके गठबंधन के लिए खुली है और यदि पार्टी सत्ता में आती है तो सहयोगी दलों के साथ सत्ता साझा करने के लिए भी तैयार रहेगी, लेकिन अब तक कोई छोटा दल भी संभावित गठबंधन के लिए आगे नहीं आया है।
टीवीके खुद को द्रमुक के विकल्प के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रही है। 'सत्ता साझा' की पेशकश को लेकर राजनीतिक बहस भी हुई, लेकिन यह प्रस्ताव दलों को आकर्षित करने के लिए पर्याप्त साबित नहीं हुआ है। न तो द्रमुक-नेतृत्व वाले धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशील गठबंधन में कोई सेंध लगी है और न ही प्रेमलता विजयकांत की डीएमडीके, अंबुमणि रामदास और उनके पिता एस. रामदास के पीएमके गुट, तथा टीटीवी दिनाकरन की अम्मा मक्कल मुनेत्र कषगम (अममुक) जैसी पार्टियां विजय के प्रति उत्साह दिखा रही हैं।
अंबुमणि रामदास का पीएमके गुट और अममुक दोनों ही मुख्य विपक्षी अन्नाद्रमुक के नेतृत्व वाले राजग गठबंधन में शामिल हो चुके हैं। इसमें अन्नाद्रमुक महासचिव एडप्पाडी के. पलानीस्वामी को मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित किया गया है। वहीं डीएमडीके और रामदास गुट की पीएमके फिलहाल किसी भी पक्ष में स्पष्ट रूप से जाने से बचती दिख रही हैं और उनके लिए भी टीवीके फिलहाल विकल्प नहीं बन पाई है।
राज्य कांग्रेस के एक वर्ग ने टीवीके से गठबंधन को पार्टी के दीर्घकालिक हित में बताते हुए समर्थन दिया था, लेकिन तमिलनाडु कांग्रेस नेतृत्व और पार्टी आलाकमान ने इस तरह की बातों पर विराम लगाया है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि टीवीके के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि पार्टी अभी तक 'अनपरीक्षित' है। विजय की लोकप्रियता, रैलियों में भारी भीड़ और कुछ पूर्व-चुनावी सर्वेक्षणों में 20 प्रतिशत से अधिक वोट शेयर का अनुमान उनकी लोकप्रियता का संकेत तो देते हैं, लेकिन इन्हें वास्तविक मतदान का प्रतिबिंब नहीं माना जा सकता। इसके अलावा, टीवीके के पास फिलहाल किसी प्रमुख समुदाय या व्यापक सामाजिक वर्ग का संगठित समर्थन आधार भी नहीं दिखता।
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या विजय युवाओं, महिलाओं और अपनी ऑन-स्क्रीन करिश्माई छवि के सहारे अपनी पहली चुनावी लड़ाई में टीवीके को एक प्रभावशाली राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित कर पाते हैं या फिर पार्टी केवल 'स्पॉयलर' की भूमिका तक सीमित रह जाती है।
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