भुवनेश्वर , जुलाई 18 -- उड़ीसा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश हरीश टंडन ने शनिवार को कहा कि भले ही तकनीकी प्रगति और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) ने न्यायिक प्रणाली की कार्यकुशलता में काफी सुधार किया है, लेकिन वे कभी भी मानवीय विवेक, करुणा और स्वतंत्र कानूनी तर्क का स्थान नहीं ले सकते।
न्यायमूर्ति टंडन ने यहां शिक्षा 'ओ' अनुसंधान (एसओए) डीम्ड विश्वविद्यालय के विशेष दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि तकनीक के तेजी से विकास ने अदालतों के पारंपरिक तौर-तरीकों में बड़ा बदलाव लाया है। फिर भी तकनीक की भूमिका मानवीय निर्णय लेने की प्रक्रिया के पूरक के रूप में ही रहनी चाहिए। उन्होंने कहा, "मैं तकनीक के खिलाफ नहीं हूं, क्योंकि यह कार्यकुशलता को बढ़ाती है और अद्भुत गति से जानकारी का विश्लेषण करती है, लेकिन यह करुणा और तर्क का स्थान नहीं ले सकती।"कानून के शासन के महत्व पर प्रकाश डालते हुये, न्यायमूर्ति टंडन ने कहा कि किसी भी समाज की असली ताकत उसके कानूनों की निष्पक्षता पर टिकी होती है। उन्होंने कहा कि कानून का शासन केवल एक काल्पनिक विचार नहीं है, बल्कि यह नैतिकता, ईमानदारी, पारदर्शिता और न्याय की तलाश से जुड़ा हुआ है। उन्होंने संवैधानिक नैतिकता को वह मार्गदर्शक शक्ति बताया जो भारत के संघीय ढांचे को बनाये रखती है और संविधान में निहित आदर्शों की रक्षा करती है।
उन्होंने कहा, "संवैधानिक नैतिकता हमें याद दिलाती है कि प्रगति हमेशा निष्पक्षता, गरिमा और जवाबदेही पर आधारित होनी चाहिए।" 'संतोष सिंह बनाम भारत संघ' मामले में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ के एक फैसले का हवाला देते हुये, न्यायमूर्ति टंडन ने कहा कि गणतंत्र की ताकत न केवल संविधान के प्रावधानों में है, बल्कि उन्हें लागू करने की जिम्मेदारी संभालने वालों की प्रतिबद्धता में भी निहित है।
उन्होंने कहा कि न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने नैतिकता को एक न्यायपूर्ण समाज के आवश्यक मूल्यों में से एक बताया था और बढ़ती वैश्विक चुनौतियों के बीच विचारों की बहुलता तथा विविधता को अपनाने के महत्व पर जोर दिया था। उन्होंने कहा कि अलग विचार रखने वालों के प्रति सहिष्णुता और आर्थिक एवं सामाजिक परिस्थितियों के कारण समाज के हाशिये पर धकेले गये लोगों के प्रति सहानुभूति एक न्यायपूर्ण समाज के अनिवार्य मूल्य हैं। उन्होंने आगे कहा कि ये सिद्धांत 4 नवंबर, 1948 को संविधान सभा में डॉ. बी.आर. आंबेडकर के दिये गये भाषण की याद दिलाते हैं।
कानून की पढ़ाई कर रहे छात्रों को संबोधित करते हुये उन्होंने भविष्य के वकीलों से कहा कि उनका पहला कर्तव्य कानून और न्याय व्यवस्था को बनाये रखना है। उन्होंने कहा, "यह सोचना गलत है कि एक वकील केवल अपने मुवक्किल की आवाज होता है। एक वकील का मुख्य कर्तव्य कानून का पालन करना और उसे बनाये रखना है। नैतिकता और मूल्य कानूनी पेशे के दो मजबूत स्तंभ हैं।"समारोह के सम्मानित अतिथि न्यायमूर्ति कृष्ण श्रीपाद दीक्षित ने अनुसंधान में भारत के कम निवेश पर चिंता व्यक्त की और अनुसंधान के लिए बजट आवंटन को "बेहद कम" बताया। वर्ष 1948 में गठन के बाद इजरायल के विकास का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इजरायल के पहले प्रधानमंत्री डेविड बेन-गुरियन ने दुनिया भर के यहूदी विद्वानों को वापस लौटने और राष्ट्र निर्माण में योगदान देने के लिए आमंत्रित किया था। यह राष्ट्रीय विकास में अनुसंधान और शैक्षणिक उत्कृष्टता की बदलने वाली भूमिका को दर्शाता है।
दीक्षांत समारोह में 300 से अधिक शोधार्थियों को पीएचडी की उपाधि प्रदान की गयी। इस अवसर पर, एसओए ने उड़ीसा उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति कृष्ण श्रीपाद दीक्षित को डॉक्टर ऑफ लॉ की मानद उपाधि प्रदान की। इस समारोह में उड़ीसा उच्च न्यायालय के 15 न्यायाधीश और कर्नाटक उच्च न्यायालय के पांच न्यायाधीश शामिल हुए।
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