नयी दिल्ली , मई 12 -- केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने मंगलवार को देश में हाइपर-लोकल और प्रभाव आधारित मौसम सेवाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से दो अत्याधुनिक मौसम पूर्वानुमान प्रणालियों की शुरुआत की।

डॉ. सिंह ने आज यहां एक कार्यक्रम में कहा कि पिछले एक दशक में भारत की मौसम पूर्वानुमान क्षमता में अभूतपूर्व बदलाव आया है। आधुनिक तकनीक, डेटा एकीकरण और उन्नत मॉडलिंग के कारण भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) की भविष्यवाणियों की सटीकता और विश्वसनीयता में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। आज आईएमडी शासन, आपदा प्रबंधन, कृषि योजना और आम जनजीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।

उन्होंने कहा कि नयी प्रणालियों को भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी), भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (आईआईटीएम), पुणे और राष्ट्रीय मध्यम अवधि मौसम पूर्वानुमान केंद्र ने संयुक्त रूप से विकसित किया है। उन्होंने कहा कि ये प्रणालियां पारंपरिक मौसम पूर्वानुमान से आगे बढ़कर निर्णय-सहायक और प्रभाव आधारित पूर्वानुमान की दिशा में बड़ा कदम हैं, जो किसानों, प्रशासन, आपदा प्रबंधकों और नागरिकों को स्थान-विशिष्ट और उपयोगी जानकारी प्रदान करेंगी।

उन्होंने बताया कि एआई आधारित मानसून पूर्वानुमान प्रणाली देश के विभिन्न हिस्सों में मानसून की प्रगति का चार सप्ताह पहले तक संभावित पूर्वानुमान हर बुधवार जारी करेगी। यह सेवा 16 राज्यों और 3,000 से अधिक उप-जिलों के किसानों तक कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के माध्यम से पहुंचाई जाएगी। इसमें एआई मॉडल, विस्तारित अवधि पूर्वानुमान प्रणाली और सांख्यिकीय तकनीकों का उपयोग किया गया है।

उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश के लिए शुरू की गई पायलट परियोजना के तहत 1 किलोमीटर स्थानिक रिजॉल्यूशन पर 10 दिन पहले तक वर्षा का पूर्वानुमान उपलब्ध कराया जाएगा। यह प्रणाली ऑटोमैटिक रेन गेज, ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन, डॉप्लर वेदर रडार और उपग्रह आधारित वर्षा आंकड़ों को एआई आधारित डाउनस्केलिंग तकनीक के साथ जोड़कर काम करेगी।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि इस पहल से कृषि, जल संसाधन, नवीकरणीय ऊर्जा, शहरी नियोजन, आपदा प्रबंधन और बुनियादी ढांचा क्षेत्रों को बड़ा लाभ मिलेगा। किसानों को बुवाई, सिंचाई, फसल सुरक्षा और कटाई संबंधी निर्णय अधिक सटीक स्थानीय जानकारी के आधार पर लेने में मदद मिलेगी। डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि पिछले दशक में गंभीर मौसम घटनाओं के पूर्वानुमान की सटीकता में लगभग 40 प्रतिशत सुधार हुआ है।

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