चंडीगढ़ , अक्टूबर 17 -- पंजाब सरकार के पूर्व विशेष मुख्य सचिव और 2010 से 2012 तक वित्त विभाग के प्रधान सचिव रहे केबीएस सिद्धू ने शनिवार को केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को पत्र लिखकर रुपये को स्थिरता मिलने तक भारतीय कंपनियों के विदेश में नए निवेश की सीमा अस्थायी रूप से घटाई जाने का सुझाव दिया है।

उन्होंने सवाल उठाया कि जब देश डॉलर जुटाने और विदेशी मुद्रा को भारत में बनाए रखने के लिए प्रोत्साहन दे रहा है,तो बड़ी कंपनियों को विदेश में भारी निवेश करने की इतनी खुली छूट क्यों है।

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर संजय मल्होत्रा को भी भेजे गए पत्र में श्री सिद्धू ने कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की विदेशी मुद्रा अनिवासी (बैंकिंग) यानी एफसीएनआर (बी) जमाओं के लिए विशेष स्वैप सुविधा 16 अक्टूबर को समाप्त हो गयी। उनके अनुसार, इस सुविधा के तहत जून से जुलाई के बीच ऐसी जमाएं करीब 32.6 अरब डॉलर से बढ़कर 60.6 अरब डॉलर हो गईं। बैंकों ने इन जमाओं पर 6.5 प्रतिशत तक ब्याज दिया और नई जमा राशि के लगभग 28 अरब डॉलर से जुड़े विनिमय दर जोखिम की जिम्मेदारी अब तीन से पांच वर्ष के लिए आरबीआई पर है।

श्री सिद्धू ने पत्र में कहा कि एक ओर देश डॉलर जुटाने के लिए प्रोत्साहन दे रहा है, वहीं दूसरी ओर विदेश में निवेश के लिए कंपनियों पर समान स्तर की बंदिशें नहीं हैं। उन्होंने व्यक्तिगत और कॉरपोरेट विदेशी निवेश के नियमों में अंतर का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत का निवासी व्यक्ति उदारीकृत प्रेषण योजना के तहत सालाना अधिकतम 2.5 लाख डॉलर विदेश भेज सकता है। निवेश के लिए 10 लाख रुपये से अधिक के प्रेषण पर 20 प्रतिशत स्रोत पर कर संग्रह (टीसीएस) भी लागू होता है। इसके विपरीत, भारतीय कंपनियां स्वत: मंजूरी मार्ग के तहत अपनी कुल संपत्ति के 400 प्रतिशत तक विदेश में निवेश कर सकती हैं। सालाना एक अरब डॉलर से अधिक के निवेश के लिए आरबीआई की मंजूरी आवश्यक होती है।

श्री सिद्धू के अनुसार, भारतीय कंपनियों ने वित्त वर्ष 2025-26 में विदेश में 48.6 अरब डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता जताई, जबकि इस वर्ष जुलाई और अगस्त में ही लगभग 9.6 अरब डॉलर के अतिरिक्त निवेश की प्रतिबद्धताएं सामने आईं। उन्होंने 2013 के उदाहरण का हवाला देते हुए कहा कि उस वर्ष रुपये पर दबाव के दौरान आरबीआई ने 14 अगस्त को कंपनियों के विदेश निवेश की स्वत: मंजूरी सीमा उनकी कुल संपत्ति के 400 प्रतिशत से घटाकर 100 प्रतिशत कर दी थी। व्यक्तिगत विदेशी प्रेषण की सीमा भी दो लाख डॉलर से घटाकर 75,000 डॉलर कर दी गई थी। जुलाई 2014 में कंपनियों की सीमा फिर बहाल कर दी गई थी। सिद्धू ने कहा कि वर्ष 2026 में विदेशी मुद्रा जुटाने के लिए 2013 जैसा उपाय अपनाया गया है, लेकिन विदेश में पूंजी के प्रवाह पर नियंत्रण के उस समय के उपाय नहीं अपनाए गए।

श्री सिद्धू ने अस्थायी और नियम-आधारित छह उपाय सुझाए हैं। इनमें नई विदेशी निवेश प्रतिबद्धताओं के लिए स्वत: मंजूरी की सीमा दो तिमाहियों तक 400 प्रतिशत से घटाकर 200 प्रतिशत करना और पहले से चल रही परियोजनाओं को इससे छूट देना शामिल है। उन्होंने सुझाव दिया कि विदेश में अर्जित कमाई से किए जाने वाले निवेश को स्वत: मंजूरी के तहत रखा जाए, जबकि रुपये को डॉलर में बदलकर किए जाने वाले निवेश के लिए नियामकीय मंजूरी आवश्यक हो। इसके अलावा, आरबीआई की पूर्व मंजूरी की वार्षिक सीमा एक अरब डॉलर से घटाकर 50 करोड़ डॉलर करने की सिफारिश की गई है। सिद्धू ने ऊर्जा सुरक्षा, महत्वपूर्ण खनिजों, प्रौद्योगिकी और निर्यात बाजारों तक पहुंच सुनिश्चित करने वाले निवेशों को प्राथमिकता देने तथा अन्य निवेशों को बाद के लिए टालने का सुझाव भी दिया। उन्होंने वास्तविक विदेशी पूंजी प्रवाह, गारंटी के तहत भुगतान और एफसीएनआर स्वैप की लागत का तिमाही विवरण सार्वजनिक करने की मांग की। साथ ही, बड़ी कंपनियों से गैर-जरूरी विदेशी निवेश प्रतिबद्धताओं को कुछ समय के लिए टालने का आग्रह करने की भी सिफारिश की।

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