लुधियाना , सितंबर 02 -- गुरु अंगद देव पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय (गड़वासू ) के वेटरिनरी एंड लाइवस्टॉक इनोवेशन एंड इनक्यूबेशन फाउंडेशन (वीएलआईआईएफ) के तहत इनक्यूबेटेड फ्रंटरनर फार्म्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड (एफएफआईएन) ने भुवनेश्वर स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ लाइफ साइंसेज (आईएलएस) के साथ मिलकर डेयरी चारे और दूध में अफ्लाटॉक्सिन प्रदूषण से निपटने के लिए माइक्रोबियल तकनीक विकसित करने की पहल की है।
इस संबंध में आईएलएस के निदेशक डॉ देबाशीष दास और एफएफआईएन के संस्थापक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी पंकज नवानी ने बुधवार को समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किये। इस अवसर पर कॉलेज ऑफ एनिमल बायोटेक्नोलॉजी के डीन एवं वीएलआईआईएफ के निदेशक डॉ. आर.एस. सेठी, डॉ. निकोलस टॉमकिन्स तथा एफएफआईएन की टीम मौजूद रही।
साझेदारी के तहत स्थानीय गैर-विषैले सूक्ष्मजीवों का इस्तेमाल कर विष पैदा करने वाले 'एस्परगिलस फ्लेवस' को चारे और भंडारित अनाज में नियंत्रित करने पर काम किया जाएगा, ताकि विष बनने से पहले ही उसे रोका जा सके। एफएफआईएन पंजाब में अपने डेयरी नेटवर्क के माध्यम से इस तकनीक के फील्ड ट्रायल करेगा और दूध की गुणवत्ता के आधार पर इसकी प्रभावशीलता का आकलन करेगा।
विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. जे.पी.एस. गिल ने आईएलएस, एफएफआईएन और वीएलआईआईएफ की टीमों को बधाई देते हुए कहा कि यह पहल अकादमिक शोध, जैव प्रौद्योगिकी, उद्यमिता और डेयरी क्षेत्र में व्यावहारिक नवाचार के बीच महत्वपूर्ण समन्वय का उदाहरण है। उन्होंने कहा कि पशुधन एवं डेयरी क्षेत्र के लिए वैज्ञानिक नवाचारों को व्यावहारिक समाधान में बदलने में ऐसे अकादमिक-औद्योगिक सहयोग महत्वपूर्ण हैं।
डॉ आर.एस. सेठी ने कहा कि इस साझेदारी से आईएलएस की वैज्ञानिक विशेषज्ञता और एफएफआईएन के फील्ड नेटवर्क को वीएलआईआईएफ के इनक्यूबेशन तंत्र के साथ जोड़ा गया है। उन्होंने कहा कि व्यावसायिक डेयरी परिस्थितियों में तकनीक का परीक्षण स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र के साथ-साथ सुरक्षित चारे और दूध के लिए विश्वविद्यालय की जैव प्रौद्योगिकी आधारित नवाचार प्रतिबद्धता को मजबूत करेगा।
आईएलएस के निदेशक डॉ देबाशीष दास ने बताया कि आईएलएस जैव प्रौद्योगिकी विभाग, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय, भारत सरकार के अधीन एक स्वायत्त संस्थान है। समझौते के तहत आईएलएस अपनी माइक्रोबियल कल्चर कलेक्शन और आणविक पहचान क्षमता का उपयोग करते हुए सूक्ष्मजीवों की खोज एवं विशेषताओं का अध्ययन करेगा। इसमें अफ्लाटॉक्सिन बी1 बनाने वाले जैवसंश्लेषण जीन की पीसीआर आधारित पहचान भी शामिल होगी।
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