चंडीगढ़ , अक्टूबर 18 -- केन्द्र सरकार के पूर्व सचिव ईएएस शर्मा ने रविवार को नीति आयोग से केंद्र और राज्यों की डेटा सेंटर नीतियों के बीच समन्वय स्थापित करने का आग्रह किया है। उन्होंने कहा कि डेटा सेंटरों के विस्तार को लेकर सामान्य ढर्रे पर चलने की नीति भविष्य में गंभीर समस्याएं पैदा कर सकती है। इसके लिए पर्यावरण संरक्षण, जल संसाधनों और बिजली आपूर्ति पर पड़ने वाले प्रभावों को ध्यान में रखते हुए एक मजबूत राष्ट्रीय नीति बनाना जरूरी है।

नीति आयोग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अनुराग जैन को लिखे पत्र में श्री शर्मा ने डेटा सेंटरों की मंजूरी से पहले उनके पर्यावरणीय और सामाजिक-आर्थिक प्रभावों का व्यापक आकलन करने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि नई तकनीकों के अनुरूप डेटा संरक्षण कानूनों को भी मजबूत किया जाना चाहिए।

श्री शर्मा के अनुसार, बड़े और अति-विशाल डेटा सेंटरों को निर्बाध तथा उच्च गुणवत्ता वाली बिजली की आवश्यकता होती है, जिससे बिजली ग्रिड पर काफी दबाव पड़ सकता है। आपूर्ति में कुछ मिनट का व्यवधान भी ग्रिड में उतार-चढ़ाव पैदा कर सकता है और उपभोक्ताओं के उपकरणों को नुकसान पहुंचा सकता है। उन्होंने चिंता जताई कि कई राज्य डेटा सेंटरों को बहुत कम दरों पर बिजली उपलब्ध कराने पर सहमत हो रहे हैं। इससे बिजली संबंधी बुनियादी ढांचे के लिए आवश्यक संसाधन जुटाना राज्यों के लिए कठिन हो सकता है और इसका आर्थिक बोझ अन्य बिजली उपभोक्ताओं या करदाताओं पर पड़ सकता है।

पत्र में श्री शर्मा ने आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में प्रस्तावित डेटा सेंटर परियोजनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि आंध्र प्रदेश में 7.9 गीगावाट क्षमता और तेलंगाना में पांच गीगावाट क्षमता के डेटा सेंटरों को मंजूरी दी गई है। उन्होंने चिंता जताई कि इन राज्यों के जिन क्षेत्रों में परियोजनाएं स्थापित की जा रही हैं, वहां पहले से ही जल संसाधनों पर दबाव है।

उन्होंने दावा किया कि केंद्र सरकार की ओर से डेटा सेंटरों को 2047 तक दी गई कर छूट का मूल्य प्रत्येक एक गीगावाट क्षमता पर करीब 95,000 करोड़ रुपये बैठता है। उनके अनुसार, आंध्र प्रदेश की ओर से दी जा रही कर रियायतों तथा बिजली, पानी और अन्य संसाधनों पर सब्सिडी का मूल्य भी प्रति गीगावाट करीब 22,000 करोड़ रुपये है। उन्होंने कहा कि कुछ राज्य डेटा सेंटरों को केवल निर्माण परियोजनाओं के रूप में देख रहे हैं, जबकि इनके व्यापक प्रभावों का आकलन जरूरी है। उन्होंने नीति आयोग से ऐसे दिशानिर्देश बनाने का आग्रह किया, जिनसे राज्यों में जल्दबाजी में लिए जाने वाले फैसलों और संसाधनों के अनुचित उपयोग को रोका जा सके।

श्री शर्मा ने कहा कि विदेशी डेटा सेंटरों से भारत की डेटा संप्रभुता से जुड़े सवाल भी उठते हैं। उन्होंने बड़े डेटा सेंटरों के लिए एक प्रभावी पर्यावरणीय प्रभाव आकलन व्यवस्था लागू करने का सुझाव दिया, जिसमें परियोजनाओं को मंजूरी देने से पहले जन परामर्श और स्थानीय जल संसाधनों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के प्रावधान हों। साथ ही, स्थानीय समुदायों पर पड़ने वाले सामाजिक-आर्थिक प्रभावों का भी आकलन किया जाना चाहिए।

ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन (एआईपीईएफ) के मीडिया सलाहकार वीके गुप्ता ने कहा कि मुंबई और विशाखापत्तनम जैसे शहरों में पानी और बिजली की खपत को लेकर डेटा सेंटरों के विरोध के बाद देश में इस क्षेत्र के लिए नीति तैयार करने की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है।

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