नयी दिल्ली , अक्टूबर 08 -- उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को झारखंड सरकार के उस नियम की वैधता पर गंभीर सवाल उठाए, जिसके तहत सेवानिवृत्ति से छह महीने से कम की सेवा शेष रहने वाले अधिकारी को भी पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) पद के लिए पात्र माना गया है। न्यायालय ने प्रथम दृष्टया टिप्पणी करते हुए कहा कि यह प्रावधान वर्ष 2006 के ऐतिहासिक 'प्रकाश सिंह' मामले में जारी निर्देशों के प्रतिकूल प्रतीत होता है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने कहा कि अगर यह नियम राज्य पुलिस प्रमुखों की नियुक्ति और कार्यकाल के लिए निर्धारित सुरक्षात्मक उपायों को कमजोर करता है, तो इसे बरकरार नहीं रखा जा सकता। शीर्ष न्यायालय ने झारखंड सरकार को इस प्रावधान पर पुनर्विचार करने या अपना जवाब दाखिल करने के लिए एक सप्ताह का समय दिया है।

उच्चतम न्यायालय ने झारखंड की वर्तमान डीजीपी तड़ाशा मिश्रा को भी नोटिस जारी किया है। पीठ ने स्पष्ट किया कि इस नियम की वैधता पर आने वाले किसी भी फैसले का असर उनकी नियुक्ति पर पड़ सकता है।

शीर्ष न्यायालय ने इस मामले में एमिकस क्यूरी (न्यायालय मित्र) वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन से न केवल झारखंड के नियमों बल्कि अन्य राज्यों में मौजूद समान प्रावधानों और उनके तहत हुई नियुक्तियों की जांच करने को कहा है। संघ लोक सेवा आयोग को इस संबंध में एमिकस की सहायता करने का निर्देश दिया गया है।

यह मामला केंद्र सरकार के झारखंड के 2025 के उन नियमों को चुनौती देने से जुड़ा है जो राज्य में डीजीपी के चयन और नियुक्ति से जुड़े हैं। केंद्र ने झारखंड में आईपीएस अधिकारी अनुराग गुप्ता और सुश्री मिश्रा की नियुक्तियों को चुनौती दी है। केंद्र के अनुसार, श्री गुप्ता को फरवरी 2025 में केवल तीन महीने की सेवा शेष रहने पर नियुक्त किया गया था, जबकि सुश्री मिश्रा को दिसंबर 2025 में उनकी सेवानिवृत्ति से ठीक एक दिन पहले छह महीने के अवशिष्ट-सेवा नियम को हटाकर डीजीपी बनाया गया था।

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