नयी दिल्ली , मई 19 -- रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने आंध्र प्रदेश के कुरनूल स्थित डीआरडीओ परीक्षण क्षेत्र में मानव रहित हवाई यान से प्रक्षेपित सटीक निर्देशित मिसाइल (यूएलपीजीएम)-वी3 के अंतिम विन्यास विकास परीक्षणों को हवा से जमीन तथा हवा से हवा दोनों मोड में सफलतापूर्वक पूरा किया है।
रक्षा मंत्रालय ने मंगलवार रात बताया कि इन परीक्षणों को एकीकृत ग्राउंड कंट्रोल सिस्टम (जीसीएस) के माध्यम से संचालित किया गया, जिसका उपयोग यूएलपीजीएम हथियार प्रणाली की कमान और नियंत्रण के लिए किया गया। जीसीएस में अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी शामिल हैं, जो तैयारी और प्रक्षेपण संचालन को स्वचालित बनाती हैं। डीआरडीओ ने मिसाइलों के विकास और उत्पादन के लिए दो उत्पादन एजेंसियों भारत डायनेमिक्स लिमिटेड, हैदराबाद तथा अडानी डिफेन्स सिस्टम्स एंड टेक्नोलॉजीज़ लिमिटेड, हैदराबाद के साथ साझेदारी की है। परीक्षणों के लिए इस प्रणाली को बेंगलुरु स्थित न्यूस्पेस रिसर्च एंड टेक्नोलॉजीज़ द्वारा विकसित मानव रहित हवाई वाहनों पर एकीकृत किया गया है।
यूएलपीजीएम मिसाइल का विकास हैदराबाद स्थित रिसर्च सेंटर द्वारा प्रमुख प्रयोगशाला के रूप में किया गया है। इसके साथ डीआरडीओ की अन्य प्रयोगशालाएं रक्षा अनुसंधान एवं विकास प्रयोगशाला (डीआरडीएल), हैदराबाद; टर्मिनल बैलिस्टिक्स रिसर्च लेबोरेटरी (टीबीआरएल), चंडीगढ़; तथा हाई एनर्जी मैटेरियल्स रिसर्च लेबोरेटरी (एचईएमआरएल), पुणे - भी इसमें शामिल रहीं।
इस मिसाइल का निर्माण पूरी तरह भारतीय रक्षा पारिस्थितिकी तंत्र के माध्यम से किया गया है, जिसमें बड़ी संख्या में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों तथा अन्य उद्योगों की भागीदारी रही। परीक्षणों ने यह पुष्टि की कि घरेलू आपूर्ति श्रृंखला पूर्ण रूप से परिपक्व है और तत्काल बड़े पैमाने पर श्रृंखलाबद्ध उत्पादन के लिए सक्षम है।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने हवा से जमीन मोड में टैंक रोधी भूमिका तथा हवा से हवा मोड में ड्रोन, हेलीकॉप्टर और अन्य हवाई लक्ष्यों के विरुद्ध यूएलपीजीएम-वी3 के सफल विकास परीक्षणों के लिए डीआरडीओ, सार्वजनिक उपक्रमों, रक्षा उत्पादन भागीदारों और उद्योगों को बधाई दी। उन्होंने इसे रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में प्राप्त एक रणनीतिक उपलब्धि बताया।
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