नयी दिल्ली , फरवरी 28 -- उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने कहा है कि स्नातक की डिग्री केवल एक प्रमाण पत्र नहीं बल्कि समाज की सेवा, अपने कौशल का उपयोग व्यापक भलाई के लिए करने और सबसे बढ़कर, "राष्ट्र सर्वोपरि" के सिद्धांत को कायम रखने की प्रतिबद्धता है।
श्री राधाकृष्णन ने शनिवार को दिल्ली विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए विश्वविद्यालय की उल्लेखनीय 104 साल की यात्रा और शैक्षणिक उत्कृष्टता और निरंतरता के प्रति इसकी अटूट प्रतिबद्धता की सराहना की। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय की शुरुआत मात्र तीन कॉलेजों, दो संकायों, आठ विभागों, उपहार स्वरूप प्राप्त पुस्तकों के एक छोटे से पुस्तकालय और 750 छात्रों से हुई थी। आज इसमें 16 संकाय, 86 विभाग, 90 कॉलेज, 20 छात्रावास, 30 से अधिक केंद्र और संस्थान, 34 पुस्तकालय और छह लाख से अधिक छात्र हैं। उन्होंने कहा, "दिल्ली विश्वविद्यालय ने अपने ऐतिहासिक यात्रा में वाकई एक लंबा सफर तय किया है।"उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय को देश के सबसे प्रतिष्ठित उच्च शिक्षा संस्थानों में से एक बताते हुए कहा कि एक सदी से अधिक समय से इसने ऐसे विद्वानों को पोषित किया है जिन्होंने भारत के बौद्धिक, राजनीतिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक जीवन का नेतृत्व किया है। उन्होंने छात्रों से कहा कि वे अब उन प्रतिभाशाली पूर्व छात्रों की परंपरा में शामिल हो रहे हैं जिन्होंने न केवल भारत बल्कि विश्व को भी आकार दिया है। उन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में लगातार हो रहे सुधार पर संतोष व्यक्त किया। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय लगातार चार वर्षों से क्यूएस वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग में भारतीय विश्वविद्यालयों में पहले स्थान पर बना हुआ है।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि दीक्षांत समारोह महज एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं है, यह एक अंत और एक नई शुरुआत दोनों का प्रतीक है। यह वर्षों के अध्ययन, अनुशासन, मित्रता, परीक्षाओं और आत्म-खोज का उत्सव है, साथ ही स्नातकों के लिए एक व्यापक क्षेत्र, यानी उत्तरदायित्व के क्षेत्र में औपचारिक प्रवेश का संकेत भी है।
उन्होंने कहा कि स्नातक एक ऐसे संसार में कदम रख रहे हैं जो परिवर्तन से गुजर रहा है। प्रौद्योगिकी उद्योगों को नया रूप दे रही है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता कार्य की प्रकृति को पुनर्परिभाषित कर रही है, जलवायु परिवर्तन विकास के प्रतिमानों को चुनौती दे रहा है और विश्व भर में लोकतंत्र की परीक्षा हो रही है। उन्होंने कहा कि ऐसे संसार में, डिग्री केवल एक प्रमाण पत्र नहीं बल्कि एक प्रतिबद्धता है, समाज की सेवा करने की प्रतिबद्धता, अपने कौशल का उपयोग व्यापक भलाई के लिए करने की प्रतिबद्धता, केवल अपने लिए नहीं बल्कि राष्ट्र के कल्याण के लिए जीने की प्रतिबद्धता, और सबसे बढ़कर, "राष्ट्र सर्वोपरि" के सिद्धांत को कायम रखने की प्रतिबद्धता।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और दूरदृष्टि में भारत ने आत्मनिर्भर भारत बनने और 2047 तक एक विकसित भारत का निर्माण करने की आकांक्षा व्यक्त की है, जब देश अपनी स्वतंत्रता की 100वीं वर्षगांठ मनाएगा। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आत्मनिर्भरता का अर्थ है नवाचार, उत्पादन, अनुसंधान और भारतीय परिस्थितियों पर आधारित समाधानों को विकसित करने की क्षमता, जो वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी हों। उन्होंने कहा कि विकसित भारत का अर्थ है समावेशी विकास, तकनीकी नेतृत्व, सामाजिक सद्भाव, पर्यावरण स्थिरता और पारदर्शी एवं जवाबदेह संस्थाएँ। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विकास अंतिम नागरिक तक पहुँचे और अवसर सभी के लिए एक वादा बन जाए।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि यहाँ से डिग्री हासिल करने वाले चाहे वैज्ञानिक बनें, सिविल सेवक, उद्यमी, कलाकार, वकील, शिक्षक या फिर नवप्रवर्तक बनें, वे 2047 के भारत को आकार देंगे। उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत की प्राप्ति उनकी ईमानदारी, योग्यता, करुणा और नवोन्मेषी भावना पर निर्भर करेगी।
उन्होंने इस बात पर खुशी जताई कि स्नातकों में 50 प्रतिशत से अधिक और स्वर्ण पदक विजेताओं में 70 प्रतिशत से अधिक महिलाएं हैं। उन्होंने इसे देश में महिला शिक्षा की अभूतपूर्व वृद्धि का प्रमाण बताया। उन्होंने सभी स्नातक छात्रों को उनकी निरंतर मेहनत से प्राप्त इस सफलता के लिए आशीर्वाद और शुभकामनाएं दीं।
हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित