नैनीताल , जुलाई 08 -- उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने 'टीएचडीसी डिप्लोमा इंजीनियर्स एसोसिएशन' व अन्य की ओर से दायर उस रिट याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें भारत सरकार के 11 जून 2026 के उस आदेश को चुनौती दी गयी थी, जिसके तहत 'टिहरी हाइड्रो डेवलपमेंट कॉरपोरेशन इंडिया लिमिटेड' (टीएचडीसी) और 'उत्तर-पूर्वी विद्युत ऊर्जा निगम लिमिटेड' (एनईईपीसीओ) निदेशक मंडल का पुनर्गठन कियाे गया था।
न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की एकल पीठ ने मंगलवार को इस मामले की सुनवाई की, जिसकी आदेश की प्रति बुधवार को उपलब्ध हो सकी। पीठ ने स्पष्ट किया कि विवादित आदेश में कर्मचारियों की सेवा शर्तों में किसी भी प्रकार के बदलाव का कोई उल्लेख नहीं है और केवल भविष्य की आशंकाओं के आधार पर रिट याचिका दायर नहीं की जा सकती।
अदालत ने याचिका को पूरी तरह से गलत अवधारणा पर आधारित मानते हुए प्रारंभिक स्तर पर ही निरस्त कर दिया।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि वर्ष 2020 में केंद्र सरकार ने टीएचडीसी इंडिया लिमिटेड में अपनी 75 प्रतिशत हिस्सेदारी 'राष्ट्रीय ताप विद्युत निगम लिमिटेड' (एनटीपीसी) को हस्तांतरित कर दी थी। इसके बाद 11 जून 2026 के आदेश के जरिये टीएचडीसी और नीपको के बोर्ड पुनर्गठन के तहत निदेशक (तकनीकी), निदेशक (कार्मिक) और निदेशक (वित्त) के पदों को समाप्त कर दिया गया। याचिका में आशंका जतायी गयी थी कि इससे स्थायी कर्मचारियों के रोजगार हितों और सेवा शर्तों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, इसलिए कर्मचारियों के हितों की रक्षा के लिए अदालती निर्देश जारी किये जायें।
सुनवाई के दौरान भारत सरकार और टीएचडीसी इंडिया लिमिटेड की ओर से दलील दी गई कि 11 जून के आदेश में कर्मचारियों की सेवा शर्तों को बदलने की कोई बात नहीं कही गयी है। केंद्र सरकार के अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि 2020 में एनटीपीसी को हिस्सेदारी बेचे जाने के बाद से भी अब तक कर्मचारियों की सेवा शर्तों में कोई बदलाव नहीं हुआ है, जिससे यह सिद्ध होता है कि याचिका केवल आधारहीन आशंकाओं पर टिकी है।
दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद पीठ ने प्रतिवादियों की दलीलों से सहमति व्यक्त की। कोर्ट ने माना कि बोर्ड पुनर्गठन का आदेश कर्मचारियों के हितों को प्रभावित नहीं करता है और केवल काल्पनिक आशंकाओं के आधार पर न्यायिक हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता। इसी के साथ अदालत ने याचिका को खारिज कर दिया।
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