नैनीताल , मई 27 -- राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) की प्रधान पीठ ने टिहरी गढ़वाल मे जलधारा और नाले पर कथित अतिक्रमण एवं निर्माण के मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए टिहरी के जिलाधिकारी को विस्तृत अभिलेख और स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।
यह आदेश एनजीटी की पीठ ने संजय अग्रवाल बनाम उत्तराखंड राज्य एवं अन्य मामले में मंगलवार को पारित किया लेकिन आदेश की प्रति आज उपलब्ध हो पायी। पीठ में न्यायिक सदस्य न्यायमूर्ति अरुण कुमार त्यागी और विशेषज्ञ सदस्य डॉ. ए. सेंथिल वेल शामिल थे।
सुनवाई के दौरान न्यायाधिकरण ने जिलाधिकारी को निर्देश दिया कि वह एक माह के भीतर जवाब दाखिल कर यह स्पष्ट करें कि विवादित जल निकाय वास्तव में प्राकृतिक जलधारा है या मानव निर्मित वर्षा जल निकासी नाला।
न्यायाधिकरण ने यह भी पूछा कि यदि संबंधित जल निकाय प्राकृतिक जलधारा है, तो उसे प्रशासनिक अभिलेखों में नाले के रूप में क्यों दर्ज किया गया? एनजीटी ने जिलाधिकारी को संबंधित मूल राजस्व अभिलेख प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। इन दस्तावेजों में जलधारा अथवा नाले का अस्तित्व, उसका नाम, लंबाई, माप और संगम स्थल का स्पष्ट विवरण होना चाहिए।
इसके अलावा न्यायाधिकरण ने सिंचाई विभाग द्वारा तैयार नक्शे, संबंधित दस्तावेज, निर्माण से पहले और बाद के गूगल अर्थ चित्र तथा उत्तर प्रदेश लोक परिसर (अनधिकृत कब्जाधारियों की बेदखली) अधिनियम, 1972 के अंतर्गत चल रही बेदखली कार्रवाई और उस पर पारित आदेशों की प्रतियां भी प्रस्तुत करने को कहा है।
हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित