बैतूल , जून 22 -- मध्य प्रदेश के बैतूल जिले का छोटा सा गांव टिगरिया आज अपनी पारंपरिक कला, आधुनिक खेती, दुग्ध उत्पादन और धार्मिक आस्था के अद्भुत संगम के कारण देशभर में पहचान बना रहा है। कभी केवल ग्रामीण क्षेत्र के रूप में जाना जाने वाला यह गांव अब आत्मनिर्भर विकास का ऐसा मॉडल बन चुका है, जहां परंपरा और प्रगति साथ-साथ आगे बढ़ रही हैं।
जिला मुख्यालय से लगभग छह किलोमीटर दूर स्थित टिगरिया की आबादी करीब एक हजार है। लगभग 80 प्रतिशत साक्षरता दर वाला यह गांव अपनी प्रसिद्ध भरेवा कला के कारण 'क्राफ्ट विलेज' के रूप में जाना जाता है। यहां पीढ़ियों से शिल्पकार परिवार पीतल और बेल मेटल से ऐसी कलाकृतियां तैयार कर रहे हैं, जिन्होंने देश ही नहीं बल्कि विदेशों तक अपनी पहचान बनाई है।
गांव के वरिष्ठ शिल्पकार बलदेव वाघमारे ने बताया कि भरेवा कला एक बेहद बारीक और पारंपरिक तकनीक पर आधारित है। इसमें सबसे पहले मोम से आकृतियां बनाई जाती हैं, फिर उन्हें विशेष प्रक्रिया के माध्यम से पीतल और बेल मेटल में ढालकर अंतिम रूप दिया जाता है। इस कला से निर्मित मोर, हिरण, हाथी, लालटेन, देवी-देवताओं की प्रतिमाएं और आदिवासी संस्कृति से प्रेरित कलाकृतियां लोगों को विशेष रूप से आकर्षित करती हैं।
उन्हाेंने कहा कि टिगरिया की कला अब अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच चुकी है। विदेशों से मिलने वाले ऑर्डरों ने गांव के कई परिवारों की आर्थिक स्थिति मजबूत की है। ग्रामीणों का कहना है कि भरेवा कला उनके लिए केवल रोजगार का साधन नहीं, बल्कि उनकी सांस्कृतिक पहचान और विरासत का प्रतीक है। यही कारण है कि नई पीढ़ी भी इस पारंपरिक शिल्प को सीखने और आगे बढ़ाने में रुचि दिखा रही है।
हस्तशिल्प के साथ-साथ गांव ने कृषि क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति की है। यहां के किसान गन्ना और गेहूं जैसी फसलों की उन्नत खेती कर रहे हैं। आधुनिक कृषि तकनीकों के उपयोग से उत्पादन बढ़ा है और किसानों की आय में भी सुधार हुआ है। खेती के साथ पशुपालन और डेयरी व्यवसाय ने ग्रामीणों को अतिरिक्त आय का मजबूत स्रोत उपलब्ध कराया है। कई परिवार प्रतिदिन दूध उत्पादन और बिक्री के माध्यम से स्थायी आमदनी अर्जित कर रहे हैं।
टिगरिया की सबसे प्रसिद्ध कलाकृतियों में 'मोर चिमनी' का विशेष स्थान है। पीतल से निर्मित यह कलात्मक रचना पारंपरिक शिल्पकला और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत उदाहरण मानी जाती है। मोर को भारतीय संस्कृति में सौंदर्य और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, जबकि चिमनी का स्वरूप प्रकाश और सकारात्मक ऊर्जा का संदेश देता है।
स्थानीय परंपराओं के अनुसार, बेटियों के विवाह में मोर चिमनी को उपहार स्वरूप देने की परंपरा रही है। ग्रामीण मानते हैं कि यह नवदंपती के जीवन में सुख, समृद्धि और खुशहाली लेकर आती है। यही वजह है कि यह कलाकृति आज भी क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर के रूप में संरक्षित है।
आर्थिक गतिविधियों के साथ टिगरिया धार्मिक आस्था का भी महत्वपूर्ण केंद्र है। गांव का प्राचीन काली मंदिर श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का केंद्र माना जाता है। बड़ी संख्या में लोग यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं। स्थानीय मान्यता है कि मां काली के दर्शन से रोग और कष्ट दूर होते हैं तथा मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
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