झारग्राम , अक्टूबर 26 -- प्रसिद्ध चित्रकार जोगेन चौधरी कभी पश्चिम बंगाल में झारग्राम के ख्वाब गांव नहीं गये, लेकिन 2018 में आदिवासी कला पहल के लिए उनके हाथों से बनाया गया लोगो आज भी उसकी पहचान बना हुआ है।

यह लोगो उनके इस विश्वास को दर्शाता है कि महान कला दीर्घाओं और शहरों के स्टूडियो से बाहर भी फल-फूल सकती है।

चौधरी के निधन के बाद 'ख्वाब गांव' से जुड़े कलाकार और सांस्कृतिक कार्यकर्ता उन्हें एक ऐसे मार्गदर्शक के रूप में याद कर रहे हैं, जिन्होंने कोलकाता में रहते हुए चुपचाप उनके काम को आगे बढ़ाया। उन्होंने ग्रामीण कलाकारों को प्रोत्साहित किया, धन जुटाने में मदद की और एक ऐसी पहल से अपना नाम जोड़ा, जिसने जंगलों के बीच बसे एक गांव को जीवंत कलाकृति में बदल दिया।

झारग्राम के घने जंगलों के बीच स्थित लालबाजार गांव में लोढ़ा-शबर समुदाय रहता है। प्रसिद्ध साहित्यकार शिवाजी बंद्योपाध्याय ने इस गांव का नाम बदलकर 'ख्वाब गांव' रखा था और चौधरी ने इस सपने को दृश्य पहचान दी।

दक्षिणी कोलकाता स्थित अपने 'चारुबासना-जोगेन चौधरी सेंटर फॉर आर्ट्स' में बैठकर चित्रकार ने काली स्याही से इसका लोगो बनाया था। इसमें बांग्ला शब्दों 'ख्वाब गांव' के चारों ओर सूरज, चांद, पेड़ों और पहाड़ियों को उकेरा गया था। जल्द ही यह प्रतीक इस पहल की पहचान का अभिन्न हिस्सा बन गया।

इस पहल की शुरुआत 2018 के आसपास कोलकाता स्थित चलचित्र अकादमी ने की थी। अकादमी ने आदिवासी गांवों में सामाजिक विकास और आजीविका के टिकाऊ साधन उपलब्ध कराने के लिए कला को एक माध्यम बनाने की परिकल्पना की थी।

अकादमी के सचिव मृणाल मंडल ने कहा, "ख्वाब गांव का उद्देश्य केवल दीवारों पर चित्रकारी करना नहीं था। जोगेन दा हमारे काम से लगातार जुड़े रहे, उन्होंने युवा कलाकारों को प्रोत्साहित किया और जब भी सहायता की जरूरत पड़ी, हमारी मदद की।"श्री मंडल के अनुसार, श्री चौधरी ने कोलकाता में आयोजित कार्यशालाओं में बनायी गयी डोकरा कलाकृतियों की बिक्री के जरिए धन जुटाने में भी मदद की। इससे झारग्राम कभी गए बिना भी उन्हें गांवों में गतिविधियों को जारी रखने में सहायता मिली। आज ख्वाब गांव एक सामान्य गांव से बिल्कुल अलग है। यहां लगभग हर मिट्टी का घर एक कलाकृति का रूप ले चुका है। हर साल नए सिरे से रंगी जाने वाली दीवारों पर रोजमर्रा के जीवन के रंगीन दृश्य उभरते हैं। इनमें चरती हुई बकरियां, आदिवासी नृत्य, बगीचों में काम करते किसान और खेलते बच्चे शामिल हैं। आंगनों और रास्तों में ग्रामीण आकांक्षाएं तथा कलात्मक कल्पनाएं एक-दूसरे से मिलती हैं। इससे यह बस्ती एक ऐसी खुली कला दीर्घा में बदल गयी है, जिसे देखने आने वाले लोग अक्सर इसी नाम से वर्णित करते हैं।

वर्ष 2018 से 2022 के बीच लालबाजार इस पहल का प्रमुख कला केंद्र रहा। बाद में यह अभियान राधानगर क्षेत्र के आसपास के गांवों तक फैल गया। इनमें उरानशोल, गंगाधरपुर और कोनेडोबा शामिल हैं, जहां लोढ़ा, कोरा, संथाल और कुर्मी समुदायों के लोग रहते हैं।

लालबाजार से करीब छह किलोमीटर दूर स्थित उरानशोल अब इसी मॉडल को अपना रहा है। उसका लक्ष्य भी रचनात्मक गतिविधियों के जरिए आजीविका के साधन विकसित करते हुए एक और 'ख्वाब गांव' बनना है।

स्थानीय निवासी अंजलि किस्कू ने कहा, "इस परियोजना ने केवल दीवारों पर चित्र बनाने से कहीं अधिक काम किया। सामुदायिक कार्यशालाओं के जरिए बच्चों ने चित्रकारी सीखनी शुरू की। वयस्कों ने मूर्तिकला में प्रयोग किये, जबकि महिलाओं ने रजाई बनाने का काम अपनाया। प्रदर्शनी स्थल भी खोले गये, जहां स्थानीय कलाकृतियों को गांव से बाहर भी खरीदार मिलने लगे।"इस पहल से जिस एक हस्तकला को नयी गति मिली, वह 'कटुमकुटुम' है। यह एक विशिष्ट कला शैली है, जिसे अवनींद्रनाथ टैगोर ने लोकप्रिय बनाया था। इसमें जंगल से एकत्र की गई टहनियों, जड़ों, पत्तियों और लकड़ी के टुकड़ों से आकृतियां बनाई जाती हैं। यह कला अब गांव के कई लोगों के लिए आय का साधन बन गयी है।

प्रसिद्ध मूर्तिकार के. एस. राधाकृष्णन ने भी इस पहल को समर्थन दिया। आदिवासी समुदायों के साथ उनके जुड़ाव ने इस अभियान की व्यापक कलात्मक सोच को और मजबूती दी।

कलाकार सुमी किस्कू, सुस्मिता किस्कू, सायन अहिर और स्वस्तिका भक्त के लिए चौधरी का निधन व्यक्तिगत क्षति है। उनके द्वारा बनाया गया लोगो अब केवल उनके संगठन की पहचान नहीं रह गया है, बल्कि यह उस महान कलाकार की स्मृति भी है, जिसने दूरदराज के एक आदिवासी गांव और कला के जरिए सम्मान तथा आजीविका हासिल करने के उसके सपने का साथ देने का फैसला किया था।

झारग्राम के इस 'ख्वाब गांव' में जोगेन चौधरी की बनायी रेखाएं आज भी उनके निधन के बाद जीवित हैं। वे किसी संग्रहालय में नहीं, बल्कि उन दीवारों पर दिखायी देती हैं, जिन्हें हर साल दोबारा रंगा जाता है। इस तरह उस सपने को आगे बढ़ाया जा रहा है, जिसे चौधरी ने अपनी एक चित्रकारी के जरिए आकार देने में मदद की थी।

उल्लेखनीय है कि प्रसिद्ध चित्रकार जोगेन चौधरी का लंबी बीमारी के बाद गत रविवार, ( 25 अक्टूबर) को कोलकाता के एक निजी अस्पताल में 87 वर्ष की आयु में निधन हो गया।

हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित