जादूगोड़ा (जमशेदपुर) , अक्टूबर 4 -- झारखंड की प्राकृतिक धरोहर और सुंदरता तो बेमिसाल है लेकिन दूसरी तरफ राज्य में यूरेनियम की सात माइंस भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में सहयोग भी प्रदान कर रही है।
राज्य के पूर्वी सिंहभूम जिले का बांदुहुरांग ओपन कास्ट माइंस है जबकि जादूगोड़ा,भाटिन,नरवापहाड़,तुरामडीह,और बागजात यूरेनियम की भूमिगत माइंस है। इसके अलावा सरायकेला खरसावां जिले में माहुलडीह यूरेनियम की भूमिगत माइंस है। यूरेनियम कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड के तहत ये सभी माइंस है।
यूरेनियम कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (यूसीआइएल) 4 अक्टूबर 2026 को अपने अस्तित्व के 60वें वर्ष में प्रवेश किया है। इस तारीख को केवल एक सरकारी कंपनी की वर्षगांठ के रूप में देखना जादूगोड़ा की कहानी को छोटा कर देना होगा।
इसके पीछे एक ऐसी औद्योगिक, वैज्ञानिक और राष्ट्रीय यात्रा है, जिसकी शुरुआत उस समय हुई थी, जब भारत अपने परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम की बुनियादी जरूरतों को देश के भीतर पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ रहा था। आज जादूगोड़ा झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले का जाना-पहचाना नाम है। लेकिन छह दशक से कुछ अधिक पीछे जायें, तो तस्वीर अलग दिखाई देती है। 1965 में प्रकाशित भारत सरकार की पत्रिका 'योजना' ने जादूगोड़ा को एक ऐसे क्षेत्र के रूप में दर्ज किया था, जहां बड़ी संख्या में श्रमिक, अभियंता और तकनीकी विशेषज्ञ एक महत्वाकांक्षी परियोजना के निर्माण में लगे थे। परियोजना का नाम था-जादूगोड़ा यूरेनियम मिल एवं खान परियोजना। यह परियोजना परमाणु ऊर्जा विभाग द्वारा बनायी जा रही थी। 'योजना' ने उस समय इसे भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के लिए यूरेनियम उपलब्ध कराने वाली महत्वपूर्ण परियोजना के रूप में प्रस्तुत किया था।
जादूगोड़ा के शाफ्ट, खदान और मिल की तस्वीरें जो आज देखी जाती हैं, तो उनमें एक तैयार औद्योगिक परिसर दिखाई देता है। लेकिन 1965 की तस्वीर कुछ और कहानी कहती है। उस समय खदान का शाफ्ट हेडफ्रेम निर्माणाधीन था। 'योजना' के अनुसार यह ढांचा 45.5 मीटर ऊंचा था और इसे 240 घंटे में बनाया गया था। उसी अंक में निर्माणाधीन यूरेनियम प्रसंस्करण संयंत्र के अयस्क कुचलने वाले यंत्र की तस्वीर भी प्रकाशित हुई थी। पहली तस्वीर का श्रेय परमाणु ऊर्जा आयोग और दूसरी का एस. कुमार को दिया गया था। यह जादूगोड़ा के इतिहास का ऐसा दृश्य दस्तावेज है, जो बताता है कि भारत की यूरेनियम यात्रा किसी तैयार ढांचे से नहीं, बल्कि निर्माण, तकनीकी प्रयोग और संस्थागत क्षमता खड़ी करने की प्रक्रिया से शुरू हुई थी।
भारत का परमाणु कार्यक्रम शुरू से ही केवल परमाणु विजलीघर बनाने तक सीमित नहीं था। उसके लिए परमाणु ईंधन चक्र की अपनी क्षमता विकसित करना भी जरूरी था। यूरेनियम उस चक्र की बुनियादी कड़ी है। यही कारण है कि देश में यूरेनियम संसाधनों की खोज, उनका खनन और अयस्क का प्रसंस्करण परमाणु कार्यक्रम की दीर्घकालीन योजना का हिस्सा बना। जादूगोड़ा की कहानी इसी संदर्भ में समझनी होगी। यूसीआइएल के आधिकारिक विवरण के अनुसार जादूगोड़ा में खनन कार्य 1967 में शुरू हुआ और इसे देश की पहली दूरनिदाद देश की पारखी प्राप्त है। खदान तक पहुंचने के लिए 640 मीटर गहरे ऊर्ध्वाधर खनन कुएं का निर्माण किया गया था और इसका सबसे निचला उत्पादन स्तर 555 मीटर पर था। बाद में सहायक खनन कुएं को 905 मीटर तक विकसित किया गया। लेकिन 1967 केवल खदान के लिए महत्वपूर्ण वर्ष नहीं था। 4 अक्टूबर 1967 को यूरेनियम कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड की स्थापना हुई। यूसीआइएल परमाणु ऊर्जा विभाग के अधीन भारत सरकार का सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम है। कंपनी के अपने विवरण में इसे देश के परमाणु ऊर्जा चक्र में यूरेनियम की आवश्यकता पूरी करने वाली संस्था के रूप में वर्णित किया गया है। इसलिए 4 अक्टूबर 2026 को जब यूसीआईएल अपने 60वें वर्ष में प्रवेश किया तो यह तारीख जादूगोड़ा की उस यात्रा का भी प्रतीक होगी, जिसमें एक खदान धीरे-धीरे एक व्यापक खनन प्रसंस्करण तंत्र का केंद्र बन गई।
जादूगोड़ा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक यह है कि यहां खनन और प्रसंस्करण की क्षमताएं साथ-साथ विकसित हुईं। यूसीआइएल के अनुसार जादूगोड़ा, भाटिन, बागजाता और नरवापहाड़ से प्राप्त अयस्क जादूगोड़ा स्थित संयंत्र में संसाधित किया जाता है। वहां जल रासायनिक प्रक्रिया के माध्यम से अयस्क से यूरेनियम निकाला जाता है। इस प्रक्रिया में अयस्क को कुचलना, गीली पिसाई, घोल बनाकर रासायनिक उपचार करना, अपने छानना और आयन विनिमय जैसे नरमाणु चरण शामिल हैं। इसके बाद न की यूरेनियम को मैग्नीशियम डाइ यूरेनेट के रूप में प्राप्त किया जाता है, जिसे सामान्यतः पीला केक कहा जाता है। यूसीआइएल के एक तकनीकी दस्तावेज के अनुसार, जादूगोड़ा संयंत्र को 1968 में चालू किया गया था और बाद में नयी खदानों से आने वाले अयस्क को संसाधित करने के लिए इसकी क्षमता में विस्तार किया गया। यानी जादूगोड़ा की कहानी में एक महत्वपूर्ण क्रम दिखाई देता है- पहले संसाधन की खोज और परियोजना का विकास, फिर खदान, फिर प्रसंस्करण संयंत्र और उसके बाद इनके आसपास तकनीकी विशेषज्ञता का विस्तार। यह विशेषज्ञता केवल मशीनों तक सीमित नहीं रही। यूसीआइएल स्वयं जादूगोड़ा खदान को सामान्य खनन उद्योग और विशेष रूप से यूरेनियम खनन के लिए एक महत्वपूर्ण कौशल केंद्र के रूप में वर्णित करता है।
जादूगोड़ा से शुरू हुई गतिविधि आज एक बड़े परिचालन नेटवर्क में बदल चुकी है। यूसीआइएल के वर्तमान विवरण के अनुसार अयस्क का प्रसंस्करण जादूगोड़ा और तुरमडीह स्थित संयंत्रों में किया जाता है। इस विस्तार को समझने के लिए जादूगोड़ा की भूमिका को केवल एक खदान के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। वह एक ऐसे औद्योगिक नेटवर्क का शुरुआती बिंदु बना, जिसमें भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण, खनन, अयस्क परिवहन, प्रसंस्करण, विकिरण निगरानी, अभियंत्रण, पर्यावरण प्रबंधन और प्रशिक्षित मानव संसाधन सभी एक-दूसरे से जुड़े हैं। यही वजह है कि जादूगोड़ा का इतिहास भारत के परमाणु कार्यक्रम के इतिहास से में अलग करके नहीं पढ़ा जा सकता।
जादूगोड़ा की कहानी का एक पक्ष तकनीक और राष्ट्रीय आवश्यकता का है, लेकिन दूसरा पक्ष उन लोगों का है, जिनका जीवन इस औद्योगिक परिसर के साथ जुड़ा। खदानों ने रोजगार पैदा हुईं और शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन तथा अन्य सेवाओं के लिए संस्थागत ढांचे वने। लेकिन इन विकास प्रक्रियाओं के साथ स्थानीय समुदायों, भूमि, पर्यावरण और स्वास्थ्य को लेकर सवाल भी समय-समय पर उठते रहे हैं। यूरेनियम खनन की प्रकृति को देखते हुए विकिरण सुरक्षा एक अलग नियामक विषय है।
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