झाबुआ , अक्टूबर 13 -- मध्यप्रदेश के आदिवासी बहुल झाबुआ जिला मुख्यालय पर स्थित दक्षिणी महाकालिका माता का मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। माता को नगर कोट की रानी भी कहा जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, करीब 200 वर्ष पूर्व तत्कालीन राजा उदयसिंह राठौड़ ने नेहरू मार्ग पर नगर के बाहरी क्षेत्र में मंदिर की स्थापना कराई थी। कहा जाता है कि माता का स्वरूप पहले इमली के पेड़ के नीचे एक चबूतरे पर स्थापित था, जिसे समय के साथ भक्तों ने भव्य मंदिर का रूप दिया।

मंदिर में प्रतिदिन सुबह पांच बजे कांकड़ आरती होती है और माता को हलवे का भोग लगाया जाता है। मंदिर के सेवक और भक्त कांतिलाल नानावटी के अनुसार, पहले नवरात्रि की अष्टमी पर यहां हवन के दौरान राजा की ओर से पाड़े की बलि दी जाती थी। अब यह प्रथा बंद हो चुकी है और प्रतीकात्मक रूप से भूरे कद्दू की बलि दी जाती है।

मंदिर से जुड़ी एक प्रमुख मान्यता यह है कि माता को मदिरा अर्पित की जाती है और वे चांदी के प्याले से उसका पान करती हैं। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि माता उनकी मनोकामनाएं पूरी करती हैं। भक्तों के बीच यह धारणा भी प्रचलित है कि अर्पित मदिरा कहां जाती है, यह स्पष्ट नहीं हो पाया है। हालांकि, ये बातें स्थानीय धार्मिक मान्यताओं और श्रद्धालुओं के विश्वास पर आधारित हैं।

मंदिर में वर्षभर पूजा-अर्चना होती है, जबकि चैत्र और अश्विन नवरात्रि में विशेष आयोजन किए जाते हैं। अष्टमी पर हवन और कन्या भोज होता है तथा रात में गरबा आयोजित किया जाता है। मंदिर में महाकालिका माता के तीन स्वरूप विराजमान बताए जाते हैं। अपनी विशिष्ट परंपराओं और श्रद्धालुओं की आस्था के कारण यह मंदिर झाबुआ के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल है।

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