दंतेवाड़ा , मार्च 16 -- छत्तीसगढ़ में दक्षिण बस्तर के दंतेवाड़ा जिले में राज्य शासन के प्रयासों से जैविक खेती को नई गति मिली है। जिले के विकासखंड गीदम अंतर्गत ग्राम कासोली के प्रगतिशील कृषक सुरेश कुमार नाग ने रसायन मुक्त खेती के क्षेत्र में एक मिसाल कायम की है। पिछले करीब 13 वर्षों से प्राकृतिक पद्धति से खेती कर रहे नाग आज आसपास के किसानों के लिए प्रेरणास्रोत बन गए हैं।
जिला पीआरओ से सोमवार मिली जानकारी के अनुसार,सुरेश कुमार नाग ने अपनी करीब पांच एकड़ भूमि पर आत्मनिर्भर खेती का एक सफल मॉडल विकसित किया है। वे अपने खेत पर ही गोबर खाद, केंचुआ खाद और तरल जीवामृत तैयार करते हैं। रासायनिक कीटनाशकों से दूर रहते हुए वे स्थानीय वनस्पतियों से प्राकृतिक कीटनाशक बनाकर फसलों की सुरक्षा करते हैं। इस पद्धति से न केवल उनकी खेती की लागत में कमी आई है, बल्कि उनकी भूमि की उर्वरा शक्ति में भी लगातार बढ़ोतरी हो रही है।
नाग अपने खेत में परंपरागत कोसरा (मिलेट), सुगंधित धान के साथ-साथ टमाटर, बैंगन और बरबटी जैसी सब्जियों की जैविक खेती करते हैं। उनकी मेहनत का परिणाम यह हुआ है कि जैविक पद्धति से उत्पादित उनकी उपज को स्थानीय बाजार में बेहतर कीमत मिल रही है, जिससे उनकी आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
छत्तीसगढ़ शासन द्वारा जैविक एवं प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए लगातार किए जा रहे प्रयासों का ही परिणाम है कि दंतेवाड़ा जैसे क्षेत्रों में किसानों में जागरूकता बढ़ी है और जैविक खेती को नई रफ्तार मिली है। सरकार की इन योजनाओं और प्रोत्साहन ने किसानों को पारंपरिक खेती के तरीकों से हटकर पर्यावरण के अनुकूल और लाभकारी खेती अपनाने के लिए प्रेरित किया है।
सुरेश कुमार नाग की सफलता को देखते हुए उन्हें अब "मास्टर ट्रेनर" के रूप में भी जिम्मेदारी दी गई है। इस भूमिका में वे अपने गांव और आसपास के क्षेत्रों के किसानों को जैविक खेती की आधुनिक तकनीकों का प्रशिक्षण और मार्गदर्शन दे रहे हैं। वे अन्य किसानों को रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध उपयोग से होने वाले नुकसान के प्रति जागरूक कर उन्हें जैविक खेती से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं।
उनकी यह पहल न केवल उनके परिवार की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ बना रही है, बल्कि पूरे दंतेवाड़ा जिले को जैविक कृषि के एक आदर्श मॉडल के रूप में विकसित करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण योगदान दे रही है। सुरेश कुमार नाग का यह सफर यह साबित करता है कि यदि सही तकनीक और सरकारी सहयोग मिले तो किसान न केवल अपनी आय बढ़ा सकते हैं, बल्कि धरती की सेहत को भी बचाए रख सकते हैं।
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