नयी दिल्ली , सितंबर 16 -- उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली के जंतर-मंतर और देश के अन्य हिस्सों में 20 जुलाई को छात्र प्रदर्शनकारियों पर हुई कथित पुलिस बर्बरता की जांच के लिए गठित पांच सदस्यीय उच्च-स्तरीय जांच समिति के पुनर्गठन से इनकार कर दिया है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने समिति के पुनर्गठन की मांग वाली याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि समिति के खिलाफ उठाए गए आक्षेप केवल "अनुमानों और पहले से बनी धारणाओं" पर आधारित हैं। पूर्व जज न्यायमूर्ति आर. सुभाष रेड्डी की अध्यक्षता वाली इस समिति का गठन 18 अगस्त 2026 को किया गया था।
न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट किया, "इन परिस्थितियों में हम समिति के पुनर्गठन में कोई बदलाव करने के इच्छुक नहीं हैं, विशेष रूप से तब जब पुनर्गठन की मांग एचपीईसी द्वारा अपनी जांच शुरू करने से पहले ही केवल अनुमानों और पूर्वाग्रहों के आधार पर की गई है।"न्यायालय ने कहा कि समिति पर आक्षेप लगाना समय से पहले की गई कार्रवाई है। इस समिति का गठन किसी एक पक्ष का समर्थन करने के बजाय निष्पक्ष, पारदर्शी और तटस्थ जांच के माध्यम से अदालत की सहायता करने के लिए किया गया है।
न्यायमूर्ति रेड्डी के अलावा इस समिति में पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रविशंकर झा, दिल्ली उच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति शालिंदर कौर, सीबीआई के पूर्व निदेशक ऋषि कुमार शुक्ला और मेघालय के पूर्व पुलिस महानिदेशक एल.आर. बिश्नोई शामिल हैं।
इस उच्च-स्तरीय समिति को पुलिस बल के आनुपातिक उपयोग, महिला प्रदर्शनकारियों के खिलाफ लक्षित हिंसा व उत्पीड़न, प्रदर्शनकारियों को आई चोटों, पुलिस कार्रवाई के पीछे की कमांड शृंखला और मौजूदा नियमों या कानूनों के उल्लंघन के आरोपों की जांच का काम सौंपा गया है।
उच्चतम न्यायालय ने अपने ताजा आदेश में कहा है कि समिति शुरुआती चरण में पेलेट गन के कथित उपयोग, महिला प्रदर्शनकारियों के उत्पीड़न तथा दोनों पक्षों द्वारा की गई हिंसा व संपत्ति के नुकसान की जांच करे। न्यायालय व्यापक संवैधानिक प्रश्नों पर उचित समय पर विचार करेगी।
इसके साथ ही, पीठ ने एचपीईसी को कमजोर और संवेदनशील गवाहों को सुरक्षा प्रदान करने तथा उनकी पहचान, बयानों और साक्ष्यों को पूरी तरह गोपनीय रखने का निर्देश दिया है। न्यायालय ने दस्तावेजों को जमा करने के लिए एक ऑनलाइन पोर्टल बनाने का सुझाव भी दिया। इस मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. मोनिका गुसाईं और अधिवक्ता सी. सोलोमन को न्याय मित्र नियुक्त किया गया है तथा समिति से अपनी पहली रिपोर्ट जल्द से जल्द सौंपने को कहा गया है।
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