बिलासपुर , मार्च 01 -- छत्तीसगढ़ प्रदेश के 23 जिलों की अदालतों में शौचालय और पेयजल सुविधाओं की कथित अव्यवस्था को लेकर दायर जनहित याचिका पर छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने सुनवाई से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इसी विषय पर मामला पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है, ऐसे में समान मुद्दे पर दो अलग-अलग न्यायालयों में सुनवाई उचित नहीं मानी जा सकती।

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने यह आदेश पारित करते हुए याचिका निरस्त कर दी, जिसकी जानकारी आज मीडिया को दी गई।

याचिका अधिवक्ता प्रवीण वारे द्वारा दायर की गई थी, जिसमें राज्य के सभी जिला न्यायालयों एवं अधीनस्थ अदालतों में स्वच्छता, शौचालयों की स्थिति और पेयजल व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न उठाए गए थे। याचिकाकर्ता ने विशेष रूप से दिव्यांगजन, महिलाओं और ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए पृथक एवं स्वच्छ शौचालयों की उपलब्धता सुनिश्चित करने की मांग की थी। साथ ही न्यायालय परिसरों में पानी की गुणवत्ता की नियमित जांच, बायो-टॉयलेट, सैनिटरी पैड डिस्पेंसर जैसी सुविधाओं की स्थापना तथा एक प्रभावी शिकायत निवारण तंत्र विकसित करने का आग्रह किया गया था।

सुनवाई के दौरान राज्य शासन और उच्च न्यायालय प्रशासन की ओर से प्रस्तुत किया गया कि इसी विषय पर सुप्रीम कोर्ट में "राजीब कलिता बनाम भारत सरकार" प्रकरण में पहले ही विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए जा चुके हैं। शीर्ष अदालत ने देश के सभी उच्च न्यायालयों में न्यायिक अधिकारियों और वरिष्ठ प्रशासनिक पदाधिकारियों की एक विशेष समिति गठित करने का निर्देश दिया है, जो न्यायालय परिसरों में आधारभूत सुविधाओं की निगरानी और सुधार सुनिश्चित करेगी।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जब शीर्ष न्यायालय इस विषय पर व्यापक स्तर पर सुनवाई कर रहा है, तब समानांतर कार्यवाही न्यायिक प्रक्रिया के अनुरूप नहीं होगी।

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