चेन्नई , अक्टूबर 23 -- पुड्डुचेरी स्थित जवाहरलाल इंस्टीट्यूट ऑफ पोस्टग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (जिपमेर) ने केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (एमईआईटीवाई) के 'डिजिटल इंडिया भाषिणी डिवीजन' (डीआईबीडी) के साथ मिलकर शुक्रवार को 'भाषिणी उद्यत' पर एक तकनीकी परिचय और प्रदर्शन कार्यशाला का आयोजन किया।
इसका उद्देश्य स्वास्थ्य सेवा में भाषा संबंधी बाधाओं को दूर करने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) आधारित बहुभाषी समाधानों की संभावनाओं को तलाशना था।
'भाषिणी' एक राष्ट्रीय पहल है, जिसका लक्ष्य एआई-आधारित भाषा तकनीकों के माध्यम से भाषा संबंधी बाधाओं को दूर करना है, ताकि लोग कई भारतीय भाषाओं में डिजिटल सेवाओं का लाभ उठा सकें।
कार्यशाला का उद्घाटन करते हुए डीआईबीडी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) अमिताभ नाग ने जोर दिया कि एआई को स्वास्थ्य सेवा पेशेवरों के लिए एक सहायक के रूप में काम करना चाहिए-चाहे वे बाहृय रोगी (ओपीडी) , इनपेशेंट (आईपीडी) या अनुसंधान के क्षेत्र में हों। उन्होंने कहा कि एआई का काम मानवीय निर्णय लेने की क्षमता को प्रतिस्थापित करना नहीं, बल्कि क्लिनिकल विशेषज्ञता को और बेहतर बनाना होना चाहिए।
डीआईबीडी के वरिष्ठ महाप्रबंधक शैलेंद्र पाल सिंह ने 'नेशनल लैंग्वेज ट्रांसलेशन मिशन' (एनएलटीएम) की तकनीकी क्षमताओं,एपीआई और टूल्स के बारे में बताया। इसमें 'आरोग्य वाणी' और 'चित्रानुवाद' जैसे एप्लिकेशन का डेमो भी शामिल था।
स्वास्थ्य देखभाल के क्षेत्र में जिन संभावित उपयोगों पर विचार किया गया, उनमें एम्बिएंट क्लिनिकल स्क्राइबिंग, अस्पताल के वॉयस असिस्टेंट, मरीजों के लिए बहुभाषी मार्गदर्शन और मेडिकल शब्दावली शामिल हैं। जिपमेर के निदेशक डॉ. वीर सिंह नेगी ने इस बात पर जोर दिया कि नयी डिजिटल तकनीकों का इस्तेमाल करते समय क्लिनिकल वैलिडेशन, डेटा प्राइवेसी की सुरक्षा और इंसानी निगरानी का होना बहुत जरूरी है।
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