जालौन , अक्टूबर 18 -- उत्तर प्रदेश के जनपद जालौन में मां दुर्गा का अलौकिक स्वरूप केवल धार्मिक आस्था और उपासना का प्रतीक नहीं है बल्कि समाज को एकता, संगठन, कर्तव्यनिष्ठा, वात्सल्य, सद्भाव और बुराइयों के विरुद्ध संघर्ष करने की प्रेरणा भी देता है। मां दुर्गा के महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती स्वरूपों के साथ ही उनके अष्टभुजी रूप में सामाजिक जीवन के लिए अनेक महत्वपूर्ण संदेश समाहित हैं। वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. हरिमोहन पुरवार बुंदेलकर ने मां दुर्गा के स्वरूप की व्याख्या करते हुए कहा कि आवश्यकता उनके धार्मिक महत्व को जानने के साथ-साथ उनके सामाजिक चिंतन को समझने और जीवन में अपनाने की भी है।
उन्होंने बताया कि मां दुर्गा के महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती तीनों स्वरूपों की व्यापक रूप से आराधना की जाती है। ये तीनों स्वरूप क्रमशः संहार, पालन और सृजन की शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। महाकाली अन्याय और बुराइयों के विनाश का प्रतीक हैं, महालक्ष्मी संरक्षण एवं पालन का संदेश देती हैं, जबकि महासरस्वती ज्ञान, विवेक और सृजन की प्रेरणा प्रदान करती हैं। इन तीनों शक्तियों का समन्वय जीवन और समाज को संतुलित बनाने के लिए आवश्यक है।
डॉ. पुरवार बुंदेलकर के अनुसार, गुरु और शिष्य के संबंधों में भी इन तीनों शक्तियों का प्रतीकात्मक महत्व दिखाई देता है। गुरु जब शिष्य के अज्ञान को दूर करता है, उसके मिथ्या अहंकार का नाश करता है और उसके ज्ञान की रक्षा करते हुए उसे नवीन विषयों की शिक्षा देता है, तब वह संहार, पालन और सृजन के तीनों दायित्वों का निर्वहन करता है। यह दृष्टांत बताता है कि किसी व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के लिए अज्ञान का निवारण, सही मार्गदर्शन और निरंतर ज्ञानार्जन आवश्यक है।
उन्होंने महिषासुर के अत्याचार का उल्लेख करते हुए बताया कि जब असुरराज महिषासुर का आतंक चरम पर पहुंच गया था, तब देवताओं ने सामूहिक रूप से अपनी शक्तियों का समन्वय किया। इसी सम्मिलित शक्ति से देवी का प्राकट्य हुआ और उन्होंने अत्याचार का अंत किया। यह प्रसंग समाज को संदेश देता है कि अन्याय, अनाचार और अत्याचार के विरुद्ध अकेले संघर्ष करने के बजाय सभी वर्गों और घटकों को एकजुट होना चाहिए। जब समाज अपनी सामूहिक शक्ति का सकारात्मक उपयोग करता है, तभी बुराइयों पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकता है।
मां दुर्गा का अष्टभुजी स्वरूप आठों दिशाओं में सजगता, कर्मशीलता और अपने दायित्वों के प्रति तत्पर रहने की प्रेरणा देता है। उनके हाथों में धारण किए गए विभिन्न आयुध और प्रतीक जीवन की अलग-अलग परिस्थितियों का सामना करने का संदेश देते हैं। अभय मुद्रा भय से मुक्ति, क्षमा और सर्वकल्याण की भावना को दर्शाती है। त्रिशूल बुराइयों पर नियंत्रण तथा नकारात्मक प्रवृत्तियों के दमन का प्रतीक है।
धनुष-बाण दूरदर्शिता, लक्ष्य के प्रति एकाग्रता और उचित समय पर सही निर्णय लेने की प्रेरणा देते हैं। गदा सामने उपस्थित संकटों का दृढ़ता से सामना करने का संदेश देती है। खड्ग और चक्र अन्याय तथा आसुरी प्रवृत्तियों के निर्णायक अंत का प्रतीक हैं। शंख समाज को बुराइयों के विरुद्ध जागरूक करने और उनके विरोध में आवाज उठाने की प्रेरणा देता है। वहीं कमल पुष्प कठिन परिस्थितियों में भी संयम, कोमलता और सद्भाव बनाए रखने का संदेश देता है।
डॉ. बुंदेलकर ने मां दुर्गा के सिंह वाहन की व्याख्या करते हुए कहा कि सिंह शक्ति, साहस और राजसी प्रवृत्ति का प्रतीक है, जबकि मां दुर्गा ममता और वात्सल्य की प्रतिमूर्ति हैं। यह स्वरूप बताता है कि प्रेम, विवेक और आत्मसंयम के माध्यम से हिंसा, स्वच्छंदता तथा अहंकार जैसी प्रवृत्तियों को नियंत्रित कर समाजोपयोगी दिशा दी जा सकती है।
मां दुर्गा के वस्त्रों के रंगों में भी प्रतीकात्मक संदेश निहित हैं। हरा रंग जीवन, मातृत्व और वात्सल्य की निरंतरता का बोध कराता है, जबकि लाल रंग शक्ति, ऊर्जा और आध्यात्मिक भाव का प्रतीक माना जाता है। देवी की शरण में पहुंचने का भाव मन को शांति, स्थिरता और आत्मिक संतोष प्रदान करता है।
उन्होंने कहा कि मां दुर्गा का अष्टभुजी स्वरूप समाज को संगठन, परस्पर स्नेह, कर्तव्यनिष्ठा और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने की प्रेरणा देता है। देवी के विभिन्न स्वरूपों का वास्तविक संदेश तभी सार्थक होगा, जब समाज के लोग इन आदर्शों को अपने व्यवहार में उतारेंगे। एकता, करुणा, विवेक और सामूहिक प्रयासों के माध्यम से ही स्वस्थ, समरस और प्रगतिशील समाज का निर्माण संभव है।
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