जालौन , सितंबर 26 -- उत्तर प्रदेश के जालौन जिले में लगातार हो रही बारिश से खेतों में खड़ी तिल, उड़द, बाजरा, ज्वार सहित अन्य फसलों को नुकसान होने का दावा करते हुए किसानों ने शासन-प्रशासन से तत्काल सर्वे कराकर शत-प्रतिशत फसल क्षति का मुआवजा दिलाने की मांग की है। किसानों ने फसल बीमा कंपनियों की सर्वे प्रक्रिया पर भी सवाल उठाते हुए कृषि विभाग और जिले के वरिष्ठ अधिकारियों से निगरानी की मांग की है।
किसान अमर सिंह चंदेल ने कहा कि बारिश के कारण जिले के कई क्षेत्रों में फसलें खराब हो चुकी हैं। उन्होंने मांग की कि प्रभावित किसानों की फसल का निष्पक्ष सर्वे कराकर वास्तविक नुकसान के आधार पर 100 प्रतिशत मुआवजा दिया जाए। उन्होंने आरोप लगाया कि फसल बीमा के सर्वे के दौरान किसानों से संबंधित प्रपत्रों पर हस्ताक्षर तो करा लिए जाते हैं, लेकिन नुकसान के अनुपात में क्लेम निर्धारित नहीं किया जाता। उन्होंने इस मामले में कृषि विभाग और उच्च अधिकारियों से विशेष ध्यान देने की मांग की।
भारतीय किसान यूनियन के जिला प्रवक्ता दिनेश प्रताप सिंह गौर ने कहा कि बुंदेलखंड के जालौन में किसान लंबे समय से प्राकृतिक आपदाओं का सामना कर रहे हैं। कभी बारिश तो कभी अन्य मौसम संबंधी आपदाओं के कारण किसानों की फसल प्रभावित होती है। उन्होंने सरकार से जालौन के किसानों के लिए विशेष राहत पैकेज घोषित करने, प्रभावित फसलों का शत-प्रतिशत मुआवजा देने तथा किसानों के कर्ज माफ करने की मांग की।
किसान कल्लू यादव निवासी काशीखेड़ा ने कहा कि फसल खराब होने के बाद किसानों की आर्थिक स्थिति और अधिक खराब हो जाती है। उन्होंने कहा कि किसानों को प्राकृतिक आपदा से हुए नुकसान की भरपाई के लिए तत्काल राहत मिलनी चाहिए।
किसान संतराम सैनी ने कहा कि कई किसान किसान क्रेडिट कार्ड के अलावा साहूकारों से भी कर्ज लेकर बुवाई और कृषि कार्य करते हैं। फसल नष्ट होने के बाद कर्ज चुकाना मुश्किल हो जाता है। उन्होंने किसान क्रेडिट कार्ड के ऋण माफ करने और प्रभावित किसानों को पूरा मुआवजा देने की मांग की।
किसान मनीष पाल ने कहा कि किसान महंगे बीज, खाद और अन्य कृषि सामग्री खरीदकर फसल तैयार करते हैं। फसल तैयार होने के समय प्राकृतिक आपदा उनकी पूरी मेहनत पर पानी फेर देती है। उन्होंने कहा कि जालौन और बुंदेलखंड की परिस्थितियों को देखते हुए किसानों के लिए अलग से विशेष पैकेज की आवश्यकता है।
किसानों ने मांग की कि प्रशासन गांव-गांव फसल क्षति का पारदर्शी सर्वे कराए और बीमा कंपनियों द्वारा किए जा रहे सर्वे की भी निगरानी की जाए, ताकि वास्तविक नुकसान के अनुरूप किसानों को बीमा दावा और सरकारी राहत मिल सके।
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