जशपुर , अक्टूबर 20 -- छत्तीसगढ़ के जशपुर में रियासतकालीन परंपरा के अनुसार मनाया जाने वाला दशहरा अपनी अनूठी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के लिए जाना जाता है। यहां अन्य स्थानों की तरह केवल रावण के पुतले का दहन नहीं किया जाता, बल्कि प्रतीकात्मक रूप से पूरी लंका जलाई जाती है। इस आयोजन में रावण के साथ उसके पराक्रमी भाई कुंभकर्ण और पुत्र मेघनाथ सहित अहिरावण के पुतलों का भी दहन किया जाता है।
इस वर्ष भी शहर के रैनीडांड़ स्थित रणजीता स्टेडियम के पीछे कृत्रिम लंका तैयार की गई है। यहां रावण, कुंभकर्ण, मेघनाथ और अहिरावण के चार पुतले बनाए गए हैं, जिनका दहन एक साथ किया जाएगा। आयोजन में भगवान बालाजी की रथयात्रा और राजपरिवार की पारंपरिक भूमिका विशेष आकर्षण रहेगी।
लंका दहन की रस्म के लिए बालाजी मंदिर से भगवान बालाजी को लकड़ी के रथ पर विराजमान कर लाया जाएगा। आयोजन में चार रथ शामिल होंगे। पहले रथ में शस्त्रों के साथ आचार्य और पुस्तकाचार्य रहेंगे। दूसरे रथ में भगवान बालाजी विराजमान होंगे, जिसे भक्त खींचकर आयोजन स्थल तक ले जाएंगे। तीसरे रथ में सैनिक और चौथे रथ में वानर सेना के रूप में बच्चे सवार रहेंगे।
रथयात्रा रणजीता स्टेडियम के पास पहुंचकर रुकेगी। इसके बाद हनुमान की भूमिका निभाने वाला एक व्यक्ति रथ से उतरकर दौड़ते हुए रैनीडांड़ पहुंचेगा। वहां से गदा लहराते हुए वह वापस रथ के पास आएगा। इसके बाद राजपरिवार के राजा सैनिकों के साथ रैनीडांड़ में तैयार की गई कृत्रिम लंका तक पहुंचेंगे और चारों पुतलों में आग लगाकर लंका दहन की परंपरा पूरी करेंगे।
जशपुर दशहरा की एक अन्य विशेषता लंका दहन के दौरान पत्थर फेंकने की परंपरा है। पुतलों में आग लगने के बाद लोग लंका की ओर पत्थर फेंकते हैं। इस परंपरा को देखते हुए सुरक्षा के लिहाज से जलती हुई लंका से भीड़ को दूर रखा जाता है। आयोजन से पहले यह भी देखा जाता है कि कुछ लोग पुतलों के हिस्से नोचकर अपने साथ ले जाते हैं।
रावण के पुतले के हिस्से घर ले जाने की परंपरा के पीछे स्थानीय स्तर पर अलग-अलग मान्यताएं प्रचलित हैं। इस संबंध में पंडित गौरीशंकर मिश्र बताते हैं कि रावण अत्यंत बुद्धिमान ब्राह्मण था और उसने कई सिद्धियां अर्जित की थीं। इसे लेकर क्षेत्र में कई तरह की बातें जुड़ी हैं।
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