नयी दिल्ली , मार्च 05 -- छत्तीसगढ़ में पानी के संकट के समाधान के लिए 'आवा पानी झोकी' आंदोलन के जरिये किसान अपनी पांच प्रतिशत जमीन पर जल संरक्षण कर जबरदस्त जल क्रांति ला रहे हैं और यह आंदोलन तेजी से फैल रहा है।
जल शक्ति मंत्रालय की सूचना के अनुसार 'आवा पानी झोकी'आंदोलन के तहत किसान स्वेच्छा से अपनी कृषि भूमि का पांच प्रतिशत हिस्सा छोटे पुनर्भरण तालाबों और सीढ़ीदार गड्ढों के निर्माण के लिए अलग रखते हैं जिनमें वर्षा जल एकत्रित होता है। ये संरचनाएं खेतों के भीतर ही वर्षा जल को एकत्रित करती हैं, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि मानसून की हर बूंद को संरक्षित, अवशोषित और पुन: उपयोग किया जा सके।
मंत्रालय ने इस प्रयोग की उपलब्धि को उल्लेखनीय बताया और कहा कि इसके तहत जो वर्षा जल पहले बह जाता था, अब वह मिट्टी और जलभंडारों का पुनर्भरण करता है। इससे मृदा अपरदन में काफी कमी आई है और सूखे के दौरान फसलों में नमी का स्तर बेहतर हुआ है इसका सबसे बड़ा असर यह हुआ है कि भूजल पुनर्भरण स्थिर और निरंतर हो गया है।
जल संरक्षण के लिये मॉडल को अत्यंत उपयोगी बताते हुए कहा गया है कि यह सफलता सिद्ध करती है कि सतत जल प्रबंधन के लिए व्यापक स्तर पर विस्थापन या भारी पूंजी निवेश की नहीं बल्कि सामूहिक इच्छाशक्ति की ज्यादा आवश्यकता है।
अभियान को व्यापक सामुदायिक भागीदारी से मजबूती मिलने का दावा करते हुए मंत्रालय का कहना है कि महिलाएं 'नीर नायिका' बनकर उभरीं, जिन्होंने घरों का मार्गदर्शन किया और जल संरक्षण के लिए गड्ढे बनवाने में अग्रणी भूमिका निभाते हुए पारंपरिक लोकगीतों के माध्यम से जागरूकता फैलाई। इस काम में लगे युवाओं को 'जल दूत' कहा जा रहा है जो नालियों का मानचित्रण करके, नहरों से गाद निकालकर, नुक्कड़ नाटक के आयोजन और भित्ति चित्रों के माध्यम से जल संरक्षण को बढ़ावा देने के आंदेालन को ऊर्जा प्रदान कर रहे हैं। सामूहिक श्रमदान से 440 से अधिक पारंपरिक तालाबों का पुनरुद्धार हुआ और वे प्राकृतिक जल पुनर्भरण के स्रोत बन गए। आंदोलन से प्रेरित होकर, प्रधानमंत्री आवास योजना के 500 से अधिक लाभार्थियों ने भी अपने घरों के पास जल संरक्षण के गड्ढे बनवाए, जिससे जल संरक्षण एक सरकारी पहल से एक साझा सामुदायिक जिम्मेदारी में बदल गया।
मंत्रालय ने इस सफलता को सहभागिता से स्वाभाविक तक का नाम दिया और कहा कि पांच प्रतिशत मॉडल की सफलता केवल बुनियादी ढांचे में ही नहीं, बल्कि स्वामित्व में भी निहित है। इसमें 1,260 से अधिक किसानों ने अपनी भूमि पर पांच प्रतिशत जल पुनर्भरण प्रणाली को अपनाया और पूरे कोरिया जिले में 2,000 से अधिक सोख गड्ढे बनाए गए। ग्रामीण आवास योजनाओं के लाभार्थियों ने स्वेच्छा से अपने घरों के पास सोख गड्ढे बनवाए, जिससे जल पुनर्भरण दैनिक जीवन का अभिन्न अंग बन गया। इस ऐतिहासिक पहल में, समुदायों ने केवल तीन घंटों के भीतर 660 सोखने वाले गड्ढों का निर्माण किया, जो समन्वित सार्वजनिक भागीदारी की शक्ति का प्रतीक हैं।
जल संचय जन भागीदारी के प्रभाव को मात्रात्मक रूप से स्पष्ट दिखाई देने का दावा करते हुए मंत्रालय का कहना है कि इससे कई गांवों में भूजल स्तर 3 से 4 मीटर तक बढ़ गया है और 17 दूरस्थ जनजातीय बस्तियों में झरने फिर से भर गए हैं। मिट्टी में नमी बनाए रखने की क्षमता बेहतर होने के कारण कृषि उत्पादकता में सुधार हुआ है और आजीविका स्थिर होने के कारण मौसमी प्रवास में अनुमानित 25 प्रतिशत की कमी आई है।
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