झारग्राम , जुलाई 12 -- पश्चिम बंगाल में जंगलमहल के जंगलों ने शायद इतिहास में पहली बार अपना एक सबसे पुराना वादा तोड़ दिया है। बारिश का खास तोहफा और हजारों आदिवासी परिवारों की मौसमी कमाई का मुख्य जरिया माना जाने वाला कीमती जंगली मशरूम 'कुरकुरे' इस साल जंगलों से गायब है। आषाढ़ का महीना खत्म होने को है, लेकिन इस मशरूम का कहीं नामोनिशान नहीं है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि इस अभूतपूर्व संकट की वजह अल नीनो का असर, लंबे समय तक चली लू और तेजी से बदलती जलवायु है। इसने पश्चिम बंगाल के पश्चिमी हिस्से में जंगलों पर निर्भर रहने वाले परिवारों की आजीविका को लेकर बड़ी चिंता पैदा कर दी है।
पीढ़ियों से जंगलमहल के जंगल यहां के आदिवासी और गरीब परिवारों के लिए संकट के समय सहारा बनते रहे हैं। हर साल मानसून में ये परिवार खेती के खाली समय में जंगलों से साल के बीज, महुआ, केंदु पत्ते, जामुन, इमली और सबसे कीमती 'कुरकुरे' मशरूम इकट्ठा करते हैं। इसे बेचकर होने वाली आमदनी से हजारों ग्रामीण परिवारों का सालभर का खर्च चलता है।
लेकिन इस साल मौसम के बदले मिजाज ने इस पूरे चक्र को बिगाड़ दिया है। महीनों की भीषण गर्मी और लंबे सूखे के बाद मानसून के अनियमित होने से लगभग हर वन उत्पाद की पैदावार घट गई है। पश्चिम मिदनापुर और झारग्राम जिलों के गांवों में अब वन उत्पादों की आवक बहुत कम हो गई है, जिससे ग्रामीणों की कमाई सिमट गयी है।
पश्चिम मिदनापुर की 46 वर्षीय लक्ष्मी महतो साल के बीज बेचकर हर साल 1,500 से 2,000 रुपये कमा लेती थीं। इस साल जंगल में घंटों भटकने के बाद भी वह बमुश्किल 800 रुपये ही कमा पाई हैं। उन्होंने कहा, "पेड़ों में अब पहले जैसी पैदावार नहीं रही। जंगल में पूरा दिन बिताने के बाद भी टोकरी खाली ही रहती है।"झारग्राम के जामबोनी इलाके में स्थिति और भी खराब है। यहाँ के ग्रामीण बेसब्री से 'कुरकुरे' मशरूम के उगने का इंतजार कर रहे हैं, जो आमतौर पर लगातार बारिश के बाद खिली धूप निकलने पर उगती है। 52 वर्षीय रेबती सोरेन कहती हैं, "इन मशरूमों के लिए कई दिनों तक लगातार रिमझिम बारिश और फिर हल्की धूप की जरूरत होती है। इस साल मौसम का ऐसा मिजाज देखने को ही नहीं मिला।"ढेरुआ के अधराजहोरा गांव की 35 वर्षीय नमिता महतो ने बताया कि पिछले साल उन्होंने जंगली फल और मशरूम बेचकर करीब 12,000 रुपये कमाए थे, लेकिन इस साल जंगल में बीनने के लिए कुछ बचा ही नहीं है। उन्होंने कहा, "आषाढ़ बीतने को है, लेकिन जंगल में अभी तक मशरूम नहीं दिखे। यहाँ तक कि जामुन भी नहीं मिल रहे हैं। जंगल तो वहीं खड़ा है, लेकिन उसकी सौगातें गायब हो रही हैं।"स्थानीय लोगों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन अब सिर्फ फसलों को ही बर्बाद नहीं कर रहा, बल्कि जंगलों से मिलने वाली रोजी-रोटी की बुनियाद को भी खत्म कर रहा है। मानसून के दौरान लंबे समय तक सूखा रहना और फिर अचानक भारी बारिश होने से जंगल के पेड़-पौधों का प्राकृतिक चक्र पूरी तरह गड़बड़ा गया है।
भूगोल के प्रोफेसर प्रवात कुमार शीत इस संकट को अल नीनो से जोड़ते हैं। उन्होंने समझाया, "जब प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से ज्यादा बढ़ जाता है, तो अल नीनो की स्थिति बनती है। इससे मानसून का सामान्य नियम बदल जाता है। जंगलमहल सहित पूरे दक्षिण एशिया में इसका असर अनियमित बारिश, लंबी हीटवेव और अचानक होने वाली भारी मूसलाधार बारिश के रूप में दिख रहा है। यही वजह है कि वन उत्पादों की पैदावार घट रही है।"श्री शीत ने बताया कि पिछले साल कई परिवारों ने कुरकुरे मशरूम और जामुन बेचकर 15,000 से 20,000 रुपये तक कमाए थे। लेकिन इस साल भीषण गर्मी के बाद अचानक हुई भारी बारिश ने मशरूम के विकास चक्र को रोक दिया। पिछले साल के मुकाबले इस बार 'कुरकुरे' मशरूम का उत्पादन लगभग 80 प्रतिशत तक घट गया है, जिससे हजारों परिवारों की अतिरिक्त मौसमी कमाई पूरी तरह खत्म हो गई है।
इसका आर्थिक असर भी बहुत बड़ा है। जंगलमहल के बाजारों में कुरकुरे मशरूम 800 से 1,000 रुपये किलो बिकते हैं, जबकि रांची के व्यापारी इसके लिए 1,200 से 1,500 रुपये किलो तक की कीमत देते हैं। बाजार से इसका गायब होना सीधे तौर पर आदिवासियों की जेब पर चोट कर रहा है।
पर्यावरण विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यह संकट केवल मशरूम की एक फसल खराब होने तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरा जलीय और वन तंत्र खतरे में है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि खेती के नुकसान की तरह, वन उत्पादों में आने वाली इस गिरावट को सरकारी आकलनों में जगह नहीं मिल पाती, जबकि यह हजारों ग्रामीण परिवारों के जीवन का मुख्य आधार है।
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